नई दिल्ली। भारत में वायु प्रदूषण अब कोविड-19 महामारी के बाद सबसे बड़ा स्वास्थ्य संकट बन चुका है। ब्रिटेन में काम कर रहे भारतीय मूल के कई सीनियर डॉक्टरों ने कहा कि, यदि अभी ठोस और सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में इसका असर लोगों की सेहत और देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर बेहद गंभीर होगा। डॉक्टरों के मुताबिक, पिछले एक दशक में हृदय रोगों में बढ़ोतरी को अक्सर मोटापे से जोड़ा गया, लेकिन कारों, विमानों और अन्य स्रोतों से निकलने वाले जहरीले प्रदूषक तत्व इसमें बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
इंग्लैंड के लिवरपूल में कंसल्टेंट पल्मोनोलॉजिस्ट और भारत सरकार की कोविड-19 एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्य डॉ. मनीष गौतम ने कहा कि, वायु प्रदूषण पर सरकार का फोकस जरूरी तो है, लेकिन इसमें काफी देरी हो चुकी है। उनके अनुसार, भारत में प्रदूषण नियंत्रण और रोकथाम के लिए कई अहम कदम पहले से मौजूद हैं, लेकिन वे अब इस स्तर के नुकसान को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। उत्तर भारत में रहने वाले लाखों लोगों को पहले ही फेफड़ों से जुड़ा नुकसान हो चुका है और मौजूदा इलाज समस्या का सिर्फ एक छोटा हिस्सा है।
लंदन के सेंट जॉर्ज यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. राजय नारायण ने बताया कि, वायु प्रदूषण का हृदय, सांस, न्यूरोलॉजिकल और अन्य बीमारियों से सीधा संबंध साबित करने वाले पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद हैं। उन्होंने चेताया कि, कार्रवाई में देरी से न सिर्फ स्वास्थ्य बल्कि आर्थिक बोझ भी बढ़ेगा। उनके मुताबिक, सिरदर्द, थकान, हल्की खांसी, गले में जलन, पाचन संबंधी दिक्कत, आंखों में सूखापन, त्वचा पर रैश और बार-बार संक्रमण जैसे शुरुआती लक्षणों को लोग मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि ये गंभीर बीमारियों की चेतावनी हो सकते हैं।

बर्मिंघम के मिडलैंड मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट प्रोफेसर डेरेक कॉनॉली ने कहा कि, प्रदूषित शहरों में मौसम साफ दिखने के बावजूद हवा में मौजूद छोटे-छोटे कण (पार्टिकुलेट मैटर) दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ाते हैं। उन्होंने बताया कि, हृदय रोग एक धीमी प्रक्रिया है और PM जैसे कण नंगी आंखों से दिखाई नहीं देते, न ही इन्हें ब्लड प्रेशर या कोलेस्ट्रॉल की तरह आसानी से मापा जा सकता है। इसलिए लोग इनके जोखिम को समझ नहीं पाते।
डॉक्टरों के अनुसार, दिसंबर महीने में दिल्ली के अस्पतालों में सांस से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ी है। इनमें कई युवा और पहली बार इलाज कराने वाले मरीज भी शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि, सांस संबंधी बीमारियों का एक बड़ा हिस्सा अब भी बिना पहचान और इलाज के है।

‘लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज 2025’ रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में भारत में PM2.5 प्रदूषण से 17 लाख से ज्यादा मौतें हुईं। इनमें से करीब 2.69 लाख मौतें सड़क परिवहन में पेट्रोल के इस्तेमाल से जुड़ी थीं। वहीं इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन की एक वैश्विक स्टडी में कहा गया है कि, वाहनों से निकलने वाली जहरीली गैसों को नियंत्रित करने वाली नीतियां 2040 तक दुनियाभर में 19 लाख जानें बचा सकती हैं और बच्चों में अस्थमा के 14 लाख नए मामलों को रोक सकती हैं।
पार्टिकुलेट मैटर हवा में मौजूद बेहद छोटे ठोस कण और तरल बूंदें होती हैं, जो धूल, धुआं, राख और केमिकल से बनती हैं। ये इतने छोटे होते हैं कि, नंगी आंखों से दिखाई नहीं देते और सांस के जरिए शरीर में जाकर गंभीर बीमारियां पैदा कर सकते हैं। कण जितने छोटे होते हैं, स्वास्थ्य के लिए उतने ही ज्यादा खतरनाक माने जाते हैं।

23 दिसंबर को केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने स्वीकार किया कि दिल्ली में करीब 40 प्रतिशत प्रदूषण परिवहन क्षेत्र से फैलता है, जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता का नतीजा है। उन्होंने साफ और वैकल्पिक ईंधन अपनाने तथा बायोफ्यूल को बढ़ावा देने की जरूरत पर जोर दिया। वहीं, संसद में सरकार ने यह माना कि वायु प्रदूषण सांस की बीमारियों को ट्रिगर करने वाले कारकों में से एक है, हालांकि सीधे संबंध को साबित करने वाला ठोस डेटा उपलब्ध नहीं है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में दिल्ली में तीव्र श्वसन संक्रमण के दो लाख से अधिक मामले सामने आए, जिनमें करीब 30 हजार मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि, अब सिर्फ प्रदूषण नियंत्रण ही नहीं, बल्कि समय पर जांच, इलाज और जन-जागरूकता पर भी उतना ही ध्यान देना जरूरी है, वरना आने वाले समय में यह संकट और भी भयावह रूप ले सकता है।
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