भोपाल। प्रदेश में चल रहे HPV वैक्सिनेशन अभियान में चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। बेहतर अस्पताल, स्वास्थ्य ढांचा और जागरूकता के तमाम साधन मौजूद होने के बावजूद राजधानी भोपाल और इंदौर जैसे बड़े शहर टीकाकरण में बुरी तरह पिछड़ रहे हैं। इसके उलट सीमित संसाधनों वाले छोटे जिलों ने तेजी दिखाते हुए लक्ष्य का बड़ा हिस्सा पूरा कर लिया है। आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में कुल 8,03,684 बालिकाओं को एचपीवी वैक्सीन लगाने का लक्ष्य तय किया गया है, लेकिन अब तक केवल 81,359 को ही टीका लग पाया है, जो कुल लक्ष्य का लगभग 10.12 फीसदी है। कई छोटे जिले 25 से 35 प्रतिशत तक लक्ष्य हासिल कर चुके हैं, वहीं इंदौर महज 2.69 प्रतिशत और भोपाल 6.67 प्रतिशत पर ही अटका हुआ है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक HPV (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) संक्रमण महिलाओं में होने वाले सर्वाइकल कैंसर का प्रमुख कारण माना जाता है। समय रहते वैक्सीन लगने से इस गंभीर बीमारी के खतरे को काफी हद तक रोका जा सकता है। इसी वजह से प्रदेशभर में किशोरियों को जागरूक कर टीकाकरण के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
राजधानी भोपाल में अब तक 1,938 बालिकाओं को टीका लगाया जा चुका है, जबकि जिले के लिए 28,960 का लक्ष्य तय किया गया है। इस तरह अब तक करीब 6.6 प्रतिशत लक्ष्य हासिल हो पाया है। प्रदेश स्तर की प्रगति रिपोर्ट के अनुसार भोपाल जिला फिलहाल 34वें स्थान पर है।

एचपीवी वैक्सीन महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर से बचाने में अहम भूमिका निभाती है। यह शरीर को ऐसे वायरस से सुरक्षा देती है जो आगे चलकर कैंसर का कारण बन सकता है। डॉक्टरों के अनुसार सही उम्र में टीकाकरण होने पर संक्रमण का खतरा काफी कम हो जाता है और महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य की बेहतर सुरक्षा हो पाती है।
HPV वैक्सीन मुख्य रूप से 9 से 14 वर्ष की किशोरियों के लिए सबसे अधिक प्रभावी मानी जाती है। इस उम्र में शरीर में मजबूत प्रतिरक्षा विकसित होती है। जरूरत पड़ने पर 15 से 26 वर्ष तक की युवतियां भी डॉक्टर की सलाह से यह वैक्सीन लगवा सकती हैं। रजिस्ट्रेशन के लिए अभिभावक अपनी बच्चियों को नजदीकी शासकीय अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र या स्कूल टीकाकरण शिविर में ले जाकर पंजीयन करवा सकते हैं। इसके अलावा लोग घर बैठे भी यू-विन पोर्टल पर जाकर वैक्सीन के लिए रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं।
HPV वैक्सीन सर्वाइकल कैंसर से बचाव का प्रभावी माध्यम है। अभिभावक अपनी बच्चियों को समय पर यह टीका लगवाएं, ताकि भविष्य में इस गंभीर बीमारी के खतरे को काफी हद तक रोका जा सके
डॉ. मनीष शर्मा, सीएमएचओ, भोपाल
दुनिया भर में सर्वाइकल कैंसर से होनेवाली मौतों में सबसे ज्यादा भारत में होती हैं। भारतीय महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर दूसरा सबसे आम कैंसर है। इसके सालाना लगभग 1,20,000 से 1,27,000 नए मामले सामने आते हैं। इससे 67,000 से 79,000 मौतें होती हैं। वैश्विक स्तर पर सर्वाइकल कैंसर से होने वाली मौतों में यह संख्या लगभग एक चौथाई है। हालांकि एचपीवी टीकाकरण और स्क्रीनिंग के माध्यम से इसे काफी हद तक रोका जा सकता है, लेकिन देर से निदान, कम जागरूकता और ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित स्क्रीनिंग इसकी उच्च मृत्यु दर का मुख्य कारण है।
भारत में गर्भाशय ग्रीवा कैंसर के मामले विश्व में सबसे अधिक हैं। यह भारत में महिलाओं में कैंसर से होने वाली मौतों का यह दूसरा सबसे बड़ा कारण है। देश में लगभग सभी मामले उच्च जोखिम वाले ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) के लगातार संक्रमण के कारण होते हैं। इनमें विशेष रूप से टाइप 16 और 18 के मामले हैं।
हालांकि समग्र रूप से इसकी घटनाओं में कमी आ रही है, फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों और निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाली महिलाओं में यह अधिक बनी हुई है। अधिकांश मामले 40-59 वर्ष की आयु की महिलाओं में होते हैं।
एक प्रमुख समस्या यह है कि 60% से अधिक मामलों का निदान देर से, स्थानीय रूप से एडवांस स्टेज में होता है। मेडिकल विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि पैप स्मीयर जैसी स्क्रीनिंग आवश्यक है, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में, क्योंकि वहां एसआईएल (स्क्वैमस इंट्राएपिथेलियल लीजन) की दर अधिक होती है। हालांकि एक राष्ट्रीय एचपीवी टीकाकरण कार्यक्रम पर चर्चा हुई है, लेकिन व्यापक कार्यान्वयन अभी भी विकास के दौर में है।
ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच न होने के कारण इस बीमारी से ग्रसित होने का अधिक खतरा होता है। इस कैंसर के केसों की उच्च संख्या के बावजूद, पिछले कुछ दशकों में मृत्यु दर में लगातार गिरावट देखी गई है। हालांकि राज्यों के अनुसार इसमें काफी भिन्नता है।
यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन के लक्ष्य प्राप्त कर लिए जाते हैं, तो भारत में गर्भाशय ग्रीवा कैंसर को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त किया जा सकता है। अध्ययनों से पता चलता है कि यदि रणनीतियों को पूरी तरह से लागू किया जाता है, तो 2062 तक इसका पूर्ण उन्मूलन संभव है।
9-14 वर्ष की आयु: उच्चतम प्रभावशीलता (74%-93%), अक्सर पूर्ण सुरक्षा के लिए केवल दो खुराक की आवश्यकता होती है। इस आयु में टीकाकरण से सबसे मजबूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया मिलती है। 15-18 वर्ष की आयु: प्रभावशीलता 12% से 90% तक होती है, इस आयु वर्ग में जल्दी टीकाकरण कराने पर अधिक सुरक्षा मिलती है। 18-26 वर्ष की आयु: यदि पहले संक्रमण का खतरा न हो तो संक्रमण को रोकने में उच्च प्रभावशीलता होती है। हालांकि आमतौर पर युवा किशोरों की तुलना में कम होती है। इस आयु की महिलाओं पर किए गए अध्ययनों से उच्च जोखिम वाले एचपीवी प्रकारों के खिलाफ लगभग 80-83% प्रभावशीलता दिखाई देती है। 27-45 वर्ष की आयु: इस आयु वर्ग को भी लाभ हो सकता है, हालांकि उनमें पहले से एचपीवी के संपर्क में आने की आशंका अधिक होती है, जिससे निवारक लाभ कम हो जाता है।