वॉशिंगटन डीसी। अमेरिका में सत्ता, संविधान और न्यायपालिका के बीच टकराव अब खुली जंग में बदलता दिख रहा है।
शुक्रवार को US Supreme Court ने 6-3 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि, संविधान के तहत टैक्स और टैरिफ लगाने का अधिकार राष्ट्रपति को नहीं, यह अधिकार केवल अमेरिकी संसद (कांग्रेस) के पास है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि, ट्रंप प्रशासन ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत जो टैरिफ लगाए थे, वे कानून की सीमा से बाहर हैं। अदालत ने यह भी कहा कि, अमेरिका हर देश के साथ युद्ध या आपात स्थिति में नहीं है, इसलिए इस कानून का ऐसा इस्तेमाल उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नाराज ट्रंप ने बिना समय गंवाए नया दांव चला। उन्होंने ओवल ऑफिस से ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 122 के तहत नया कार्यकारी आदेश साइन किया और इसकी जानकारी अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर दी।
ट्रंप ने लिखा- मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि मैंने सभी देशों पर 10% वैश्विक टैरिफ लागू करने पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। यह लगभग तुरंत प्रभाव से लागू होगा।

सेक्शन 122, ट्रेड एक्ट 1974 का हिस्सा है। इसके तहत अगर अमेरिका को अचानक व्यापार घाटे या आर्थिक संकट का खतरा हो तो राष्ट्रपति, बिना लंबी जांच प्रक्रिया अस्थायी तौर पर 10% तक टैरिफ लगा सकता है।
हालांकि, यह टैरिफ अधिकतम 150 दिनों तक ही लागू रह सकता है। इस दौरान सरकार हालात की समीक्षा करती है और आगे की रणनीति तय करती है।
व्हाइट हाउस के दस्तावेजों के मुताबिक, 150 दिनों में अलग-अलग देशों के खिलाफ व्यापार जांच होगी। यह तय किया जाएगा कि किस देश पर आगे कितनी दर से टैरिफ लगे। जरूरत पड़ी तो दरें बढ़ाई भी जा सकती हैं। ट्रंप ने साफ कहा कि, मैं इससे कहीं ज्यादा शुल्क भी लगा सकता हूं।
ट्रंप ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बहुत निराशाजनक बताते हुए कहा कि, कुछ जज कट्टर वामपंथियों के पालतू हैं। वे देशभक्ति नहीं दिखा रहे, संविधान के प्रति वफादार नहीं हैं। वे सही फैसला लेने से डरते हैं।
उन्होंने कहा कि, मुझे अदालत के कुछ लोगों पर शर्म आती है। उनमें हमारे देश के लिए सही काम करने की हिम्मत नहीं है।
ट्रंप ने उन तीन कंजरवेटिव जजों की सराहना की, जिन्होंने फैसले से असहमति जताई-
कैवनॉ ने अपने नोट में लिखा कि, टैरिफ नीति समझदारी भरी है या नहीं, यह अलग विषय है, लेकिन उनके मुताबिक यह कानूनी तौर पर वैध हो सकती थी। उन्होंने भारत द्वारा रूसी तेल खरीद पर लगाए गए टैरिफ का भी जिक्र किया और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला बताया।
ट्रंप ने भारत को लेकर साफ कहा कि, भारत के साथ ट्रेड डील में कोई बदलाव नहीं होगा। पीएम मोदी मेरे अच्छे दोस्त हैं। हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने बताया कि, भारत, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ जैसे देशों को अब पहले तय टैरिफ के बजाय सीधे 10% ग्लोबल टैरिफ का सामना करना पड़ेगा।
इसका सीधा मतलब यह है कि भारत पर लागू कुल टैरिफ 18% से घटकर 10% रह जाएगा, जो भारतीय निर्यातकों के लिए राहत की खबर मानी जा रही है।
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इस फैसले के बाद कई देशों को अमेरिकी बाजार में टैरिफ राहत मिल सकती है।
वैश्विक व्यापार में स्थिरता आ सकती है।
शेयर बाजारों में तेजी की उम्मीद।
कई उपभोक्ता वस्तुएं सस्ती हो सकती हैं।
कुछ उत्पादों को टैरिफ से छूट भी दी गई है, जैसे-
चीन पहले से ही अमेरिकी टैरिफ का सबसे बड़ा शिकार रहा है। नए फैसले के बाद पहले से 25% टैरिफ, इसके ऊपर IEEPA के तहत 10% और अब नया 10% ग्लोबल टैरिफ। यानी चीन पर कुल 35% तक टैरिफ पहुंच सकता है।
ट्रंप प्रशासन ने संकेत दिया है कि, सेक्शन 301 (अनुचित व्यापार प्रथाएं) और सेक्शन 232 (राष्ट्रीय सुरक्षा) के तहत भी नए टैरिफ लगाए जा सकते हैं। यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव ने कहा कि अधिकांश बड़े व्यापारिक साझेदारों के खिलाफ नई जांच शुरू होगी।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले एक साल में अमेरिका ने 200 अरब डॉलर से ज्यादा टैरिफ वसूले। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह सवाल खड़ा हो गया है कि, क्या यह पैसा कंपनियों को लौटाना पड़ेगा?
ट्रंप ने कहा कि, यह मामला अगले दो साल तक कोर्ट में ही चलेगा।
इतिहास में आखिरी बार 1971 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने दुनिया पर 10% ग्लोबल टैरिफ लगाया था। इसके बाद ही भविष्य के आर्थिक संकटों से निपटने के लिए ट्रेड एक्ट 1974 लाया गया।
कोर्ट के आदेश से स्टील और एल्युमिनियम पर लगे टैरिफ खत्म नहीं हुए। रेसिप्रोकल टैरिफ और फेंटेनाइल से जुड़े 25% टैरिफ रद्द हो गए।
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