दुनिया एक बार फिर ऐसे दौर की ओर बढ़ती दिख रही है, जहां आम लोगों की जिंदगी पर बड़े पैमाने पर नियंत्रण देखने को मिल सकता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार वजह महामारी नहीं बल्कि ऊर्जा संकट है। ईरान से जुड़े तनाव और वैश्विक तेल आपूर्ति में बाधा के चलते हालात तेजी से बदल रहे हैं। तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, कई देशों में ईंधन की कमी महसूस की जा रही है और सरकारें ऐसे कदम उठा रही हैं, जिनका असर किसी ‘लॉकडाउन’ जैसा महसूस हो सकता है।
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मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण मार्ग पर असर पड़ा है, जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल सप्लाई होता है। इस स्थिति का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ा है और कच्चे तेल की कीमतें 112 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने लगी हैं। तेल महंगा होने का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है। ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ने से रोजमर्रा की चीजें भी महंगी हो रही हैं। खाद्य उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले संसाधनों की कीमतें बढ़ने से आने वाले समय में खाने-पीने की चीजों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
ऊर्जा संकट का असर एविएशन सेक्टर पर भी साफ दिखाई दे रहा है। कई एयरलाइंस कंपनियां अपनी उड़ानों में कटौती कर रही हैं। इससे यात्राएं न सिर्फ महंगी हो रही हैं, बल्कि विकल्प भी कम होते जा रहे हैं। सरकारें भी लोगों को गैर-जरूरी यात्रा से बचने की सलाह दे रही हैं। यह वही रणनीति है जो कोविड के दौरान अपनाई गई थी, जहां सिर्फ जरूरी काम के लिए ही बाहर निकलने की अनुमति थी।
दुनिया के कई हिस्सों में ईंधन की सीमित उपलब्धता के चलते राशनिंग लागू की जा रही है। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित देशों से लेकर बांग्लादेश, फिलीपींस और श्रीलंका तक पेट्रोल-डीजल के लिए लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं। कुछ देशों ने ऊर्जा वाउचर जारी किए हैं, जबकि कई जगह लोगों से यात्रा कम करने की अपील की जा रही है। यह संकेत है कि आने वाले समय में ऊर्जा की खपत को नियंत्रित करने के लिए और कड़े कदम उठाए जा सकते हैं।
ऊर्जा संकट से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने एक विस्तृत योजना पेश की है। इस योजना में सरकारों को कई सुझाव दिए गए हैं, जिनमें शामिल हैं:
ये सुझाव दिखने में साधारण लग सकते हैं, लेकिन बड़े पैमाने पर लागू होने पर इनका असर लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर गहरा पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही सरकारें इसे एनर्जी सिक्योरिटी कहें, लेकिन आम लोगों के लिए इसका अनुभव काफी हद तक लॉकडाउन जैसा हो सकता है। जब यात्रा सीमित हो, ईंधन नियंत्रित हो और लोगों को घर से काम करने के लिए कहा जाए, तो यह स्थिति एक तरह की प्रतिबंधित जीवनशैली की ओर इशारा करती है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार कारण स्वास्थ्य नहीं बल्कि ऊर्जा की कमी है।
भारत जैसे देश जो बड़े पैमाने पर तेल आयात पर निर्भर हैं, इस संकट से ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। अगर कीमतें और बढ़ती हैं तो इसका असर महंगाई, ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की जिंदगी पर साफ दिखेगा। पाकिस्तान जैसे देश पहले से आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं, ऐसे में ऊर्जा संकट उनकी स्थिति को और कठिन बना सकता है।
अगर हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले समय में सरकारें और कड़े कदम उठा सकती हैं। इसमें डिजिटल परमिट सिस्टम, सीमित यात्रा की अनुमति और ऊर्जा खपत पर नियंत्रण जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं। यह भी संभव है कि यह व्यवस्था अस्थायी न होकर लंबे समय तक लागू रहे, जिससे लोगों की जीवनशैली में स्थायी बदलाव देखने को मिले।