नई दिल्ली। केंद्र सरकार अब देश के कई शहरों में मौजूद सिविल लाइन्स इलाकों का नाम बदलने पर गंभीरता से विचार कर रही है। कहा जा रहा है कि यह कदम अंग्रजों के समय की बची हुई पहचान को खत्म करने की बड़ी योजना का हिस्सा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लक्ष्य है कि 2047 तक भारत पूरी अपनी पहचान के साथ आगे बढ़े। इसी वजह से अब नामों और चीजों को बदला जा रहा है, जो अंग्रेजों के दौर से जुड़े हुए हैं।
सरकार का मानना है कि 'सिविल लाइन्स' जैसे नाम सुनते ही अंग्रेजों का समय याद आता है। उस दौर में ये इलाके खास तौर पर अंग्रेज अफसरों के रहने के लिए बनाए जाते थे। अब सरकार चाहती है कि ऐसे नाम बदलकर भारतीय संस्कृति और परंपरा से जुड़े नए नाम रखे जाएं। इसके लिए अलग-अलग मंत्रालयों को ऐसे नामों और निशानों की पहचान करने की जिम्मेदारी दी गई है।
यह कदम सिर्फ नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे एक बड़े विजन से जोड़कर देखा जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार कहा है कि 2047 तक भारत को गुलामी की मानसिकता से पूरी तरह मुक्त करना है। इसी के तहत सरकार लगातार ऐसे फैसले ले रही है, जो देश की पहचान को और मजबूत करें और औपनिवेशिक प्रभाव को खत्म करें।
औपनिवेशिक काल के 1,500 से अधिक पुराने कानूनों को निरस्त किया गया है। इंडिया गेट की ग्रैंड कैनोपी में ब्रिटिश राजा जॉर्ज पंचम की प्रतिमा की जगह नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित की गई। रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग किया गया। नए पीएमओ को सेवा तीर्थ नाम दिया गया है। मंत्रालयों के नए भवनों को कर्तव्य भवन कहा गया है। नई संसद भवन का निर्माण भी गुलामी के प्रतीकों से मुक्ति और आत्मनिर्भर भारत की ओर एक कदम माना गया।
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सिविल लाइन्स नाम का इतिहास अंग्रेजों के शासन से जुड़ा है। 18वीं और 19वीं सदी में जब अंग्रेजों ने भारत में शहर बसाए, तब उन्होंने शहरों को अलग-अलग हिस्सों में बांटा। इनमें सिविल लाइन्स वह इलाका होता था, जहां ब्रिटिश अधिकारी-जैसे कलेक्टर, जज और कमिश्नर रहते थे। ये इलाके आम शहर से अलग होते थे और यहां चौड़ी सड़कें, बड़े बंगले और क्लब जैसी सुविधाएं होती थीं। इसके अलावा शहरों में मिलिट्री लाइन्स यानी सेना के इलाके और ओल्ड सिटी यानी पुराना शहर भी अलग-अलग बनाए जाते थे।