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1986 से 2026 तक चली बोफोर्स कहानी खत्म! 40 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की आखिरी याचिका, जानिए क्यों नहीं साबित हुए आरोप?

करीब चार दशक पुराने बोफोर्स घोटाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी याचिका भी खारिज कर दी है। अदालत के इस फैसले के बाद अब इस चर्चित मामले की कानूनी लड़ाई पूरी तरह खत्म हो गई है। 1986 की तोप खरीद डील से शुरू हुआ विवाद लंबे समय तक देश की राजनीति और जांच एजेंसियों के केंद्र में रहा।
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1986 से 2026 तक चली बोफोर्स कहानी खत्म! 40 साल बाद  सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की आखिरी याचिका, जानिए क्यों नहीं साबित हुए आरोप?
बोफोर्स केस पर सुप्रीम फैसला

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को बोफोर्स रिश्वत मामले में लंबित आखिरी याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि अब इस केस में आगे कार्रवाई की जरूरत नहीं है। अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के उस फैसले को चुनौती देने वाली अपील भी खारिज कर दी, जिसमें हिंदुजा ब्रदर्स और बोफोर्स कंपनी को राहत मिली थी। करीब 40 साल पहले शुरू हुआ यह मामला देश के सबसे चर्चित राजनीतिक विवादों में शामिल रहा था।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ ही बोफोर्स घोटाला मामले की कानूनी प्रक्रिया समाप्त हो गई है। अदालत ने याचिकाकर्ता की उस अपील को आगे सुनने से मना कर दिया, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने साल 2005 में हिंदुजा बंधुओं और स्वीडन की हथियार कंपनी एबी बोफोर्स को आरोपों से बरी कर दिया था।

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1986 की तोप खरीद डील से शुरू हुआ था विवाद

बोफोर्स मामला साल 1986 में भारत सरकार और स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुई 1,437 करोड़ रुपये की तोप खरीद डील से जुड़ा था। इस सौदे के तहत भारतीय सेना के लिए हॉवित्जर तोपें खरीदी गई थीं। साल 1987 में स्वीडन के एक रेडियो की रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस सौदे में कमीशन दिया गया। इसके बाद यह मामला देश की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन गया।

आरोप लगे लेकिन अदालत में नहीं टिक सका केस

बोफोर्स मामले में लंबे समय तक जांच चली लेकिन अदालत में आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश नहीं हो सके। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जांच एजेंसी आरोपों को मजबूत प्रमाणों के साथ साबित नहीं कर पाई। जांच के दौरान मिले कई विदेशी दस्तावेजों की प्रमाणिकता पर भी सवाल उठे। अदालत ने माना कि केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके अलावा कथित कमीशन और आरोपियों के बीच सीधा संबंध भी साबित नहीं हो सका।

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लंबी जांच और देरी से कमजोर हुआ मामला

बोफोर्स केस की जांच कई वर्षों तक चलती रही। समय बीतने के साथ कई गवाहों और आरोपियों की स्थिति बदल गई। जांच प्रक्रिया में देरी और सबूतों की कमी ने इस मामले को कमजोर कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी सीबीआई की अपील पर सवाल उठाए थे। अदालत ने कहा था कि अपील दाखिल करने में काफी देरी हुई और देरी का सही कारण नहीं बताया गया।

CBI ने आखिरी समय तक जुटाए सबूत

मामला बंद होने से पहले सीबीआई ने कुछ नए सुराग तलाशने की कोशिश की थी। एजेंसी ने अमेरिका से जुड़े कुछ रिकॉर्ड और जानकारी हासिल करने का प्रयास किया लेकिन जांच को आगे बढ़ाने लायक कोई मजबूत सबूत नहीं मिल सका। इसके बाद कानूनी प्रक्रिया के सभी रास्ते धीरे धीरे बंद होते गए और अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस मामले का अंतिम अध्याय भी समाप्त हो गया।

राजनीति में बोफोर्स का रहा बड़ा असर

बोफोर्स विवाद ने भारतीय राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला था। इस मामले को लेकर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी सरकार पर विपक्ष ने लगातार सवाल उठाए थे। 1989 के लोकसभा चुनाव में भी यह मुद्दा प्रमुख रहा और कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि कानूनी प्रक्रिया में आरोप साबित नहीं हो सके और अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के बाद करीब चार दशक पुराना यह मामला इतिहास का हिस्सा बन गया है।

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कारगिल युद्ध में बोफोर्स ने निभाई अहम भूमिका

बोफोर्स तोपों का इस्तेमाल 1999 के कारगिल युद्ध में भी हुआ था। ऊंचाई वाले इलाकों में इन तोपों ने भारतीय सेना को दुश्मन के ठिकानों पर प्रभावी हमला करने में मदद की थी। इसकी लंबी दूरी तक फायर करने की क्षमता युद्ध के दौरान काफी महत्वपूर्ण साबित हुई थी।

Aditi Rawat
By Aditi Rawat

अदिति रावत | MCU, भोपाल से M.Sc.(न्यू मीडिया टेक्नॉलजी) | एंकर, न्यूज़ एक्ज़िक्यूटिव की जिम्मेदारिय...Read More

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