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भारत में सड़ा समझकर फेंक देते हैं लोग,विदेशों में यही काला लहसुन बन गया महंगा सुपरफूड

भारत में काला पड़ चुका लहसुन अक्सर खराब समझकर फेंक दिया जाता है, लेकिन यूरोप, अमेरिका और एशिया के कई देशों में यही ब्लैक गार्लिक सुपरफूड के तौर पर बेचा जा रहा है। जानिए कैसे साधारण लहसुन खास प्रक्रिया से काला बनता है और क्यों स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसके फायदे गिनाते हैं।
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विदेशों में यही काला लहसुन बन गया महंगा सुपरफूड

भारत में अगर रसोई में रखा लहसुन काला दिखाई दे जाए तो ज्यादातर लोग उसे खराब समझकर तुरंत कूड़ेदान में फेंक देते हैं। आम धारणा यही है कि रंग बदल चुका लहसुन अब खाने लायक नहीं बचा होगा। लेकिन दुनिया के कई देशों में यही काला लहसुन एक प्रीमियम फूड प्रोडक्ट के रूप में बिक रहा है। यूरोप, अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है और लोग इसे सामान्य लहसुन से ज्यादा कीमत देकर खरीद रहे हैं। दरअसल, जिस काले लहसुन को देखकर भारतीय घरों में लोग नाक-भौं सिकोड़ लेते हैं, वही विदेशों में हेल्थ फूड स्टोर्स और हाई-एंड रेस्टोरेंट्स की शान बन चुका है। इसकी लोकप्रियता के पीछे वजह सिर्फ इसका अलग रंग नहीं, बल्कि उससे जुड़े स्वास्थ्य लाभ हैं, जिनकी चर्चा दुनियाभर में हो रही है।

आखिर क्या होता है काला लहसुन?

काला लहसुन कोई अलग किस्म का लहसुन नहीं है। यह सामान्य सफेद लहसुन से ही तैयार किया जाता है। इसके लिए लहसुन की गांठों को कई हफ्तों तक नियंत्रित तापमान और नमी वाले वातावरण में रखा जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान लहसुन में प्राकृतिक रासायनिक बदलाव होते हैं, जिससे उसका रंग धीरे-धीरे काला हो जाता है। इस बदलाव के बाद लहसुन की बनावट नरम हो जाती है और उसका स्वाद भी पूरी तरह बदल जाता है। जहां सामान्य लहसुन तीखा और तेज गंध वाला होता है, वहीं काला लहसुन हल्का मीठा और खाने में ज्यादा आसान माना जाता है। यही वजह है कि कई लोग इसे सीधे भी खाना पसंद करते हैं।

विदेशों में क्यों बढ़ रही है इसकी मांग?

पिछले कुछ वर्षों में दुनियाभर में सुपरफूड्स की मांग तेजी से बढ़ी है। इसी ट्रेंड के बीच काला लहसुन भी लोगों की पसंद बन गया है। हेल्थ कॉन्शियस लोग इसे अपनी डाइट का हिस्सा बना रहे हैं। यूरोप और अमेरिका में इसे विशेष पैकिंग के साथ बाजार में बेचा जाता है और इसकी कीमत सामान्य लहसुन की तुलना में कई गुना ज्यादा होती है। कई देशों में इसे ऑर्गेनिक फूड कैटेगरी में रखा जाता है। वहीं रेस्टोरेंट्स भी इसका इस्तेमाल खास व्यंजनों में स्वाद बढ़ाने के लिए करते हैं। इसके मीठे स्वाद और मुलायम बनावट ने इसे शेफ्स के बीच भी लोकप्रिय बना दिया है।

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सामान्य लहसुन से कैसे अलग है ब्लैक गार्लिक?

विशेषज्ञों के मुताबिक काला लहसुन बनने की प्रक्रिया के दौरान उसमें मौजूद कई यौगिकों की प्रकृति बदल जाती है। इसी वजह से इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स की मात्रा बढ़ जाती है। वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि काले लहसुन में कुछ ऐसे तत्व अधिक मात्रा में मौजूद होते हैं जो शरीर को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में मदद कर सकते हैं। यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे इम्यूनिटी के लिए फायदेमंद मानते हैं। इसके अलावा इसे दिल की सेहत और शरीर में सूजन कम करने से भी जोड़कर देखा जाता है। हालांकि किसी भी स्वास्थ्य लाभ को लेकर अंतिम निष्कर्ष के लिए संतुलित आहार और चिकित्सकीय सलाह को ही प्राथमिकता देना जरूरी माना जाता है।

गंध कम, स्वाद ज्यादा

सामान्य लहसुन को लेकर सबसे बड़ी शिकायत उसकी तेज गंध होती है। कई लोग इसी वजह से इसे नियमित रूप से नहीं खा पाते। लेकिन काले लहसुन में यह समस्या काफी हद तक खत्म हो जाती है। इसकी गंध बेहद हल्की होती है और स्वाद में मिठास आ जाती है। यही वजह है कि इसे सलाद, सूप, सॉस और कई दूसरे व्यंजनों में आसानी से शामिल किया जाता है।

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भारत में अब भी कम है जागरूकता

भारत में काले लहसुन को लेकर जागरूकता अभी सीमित है। ज्यादातर लोग रंग बदलने को खराब होने की निशानी मानते हैं। जबकि खाद्य विशेषज्ञों का कहना है कि नियंत्रित प्रक्रिया से तैयार किया गया ब्लैक गार्लिक पूरी तरह अलग उत्पाद है। इसके बारे में जानकारी की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग इसके बारे में जानते ही नहीं हैं। दुनिया के कई देशों में जहां काला लहसुन स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थ के रूप में पहचान बना चुका है, वहीं भारत में अब भी बहुत से लोग इसे देखकर सड़ा हुआ लहसुन समझ लेते हैं। बदलती खाद्य आदतों और बढ़ती स्वास्थ्य जागरूकता के बीच अब यह सुपरफूड भारतीय बाजार में भी धीरे-धीरे अपनी जगह बनाता दिखाई दे रहा है।

Sona Rajput
By Sona Rajput

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन किया है। साल 2022 ...Read More

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