शाहिद खान, भोपाल। राजधानी में सीवेज ट्रीटमेंट के बड़े दावों के बीच चौंकाने वाली हकीकत सामने आई है। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की स्टडी बताती है कि ट्रीटमेंट के बाद छोड़े जा रहे पानी में भी माइक्रो प्लास्टिक मौजूद हैं। हर लीटर में 10 से 15 (कण) पार्टिकल। इतना ही नहीं, बचने वाले स्लज में प्रति ग्राम 7 से 9 पार्टिकल पाए गए। यानी ट्रीटमेंट की प्रक्रिया के बावजूद प्लास्टिक प्रदूषण पूरी तरह नहीं रुक रहा।
इसकी वजह शहर में ट्रीटमेंट प्लांटों की कमी के साथ ही जल स्रोतों में सीधे मिलने वाले नाले हैं। बड़ी झील में माइक्रो प्लास्टिक का पैमाना 2.4 कण प्रति लीटर और छोटी झील में 6.6 कण प्रति लीटर है। जांच में सामने आया कि इन अदृश्य कणों में पैकेजिंग प्लास्टिक से निकलने वाला पॉलीइथाइलीन-पॉलीप्रोपाइलीन और कपड़ों से निकलने वाले पॉलिएस्टर-फीईटी फाइबर शामिल हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक यह रोजमर्रा के घरेलू कचरे का ऐसा रूप है जो ट्रीटमेंट सिस्टम से फिसलकर सीधे पर्यावरण में पहुंच रहा है। यह स्थिति तब है जब शहर में ट्रीटमेंट प्लांट मौजूद हैं।
यह भी पढ़ें: ठंडे पेयों का बढ़ता बाजार: ठेला से लेकर ब्रांड तक 1अरब का सालाना रिकॉर्ड
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि इस्तेमाल तकनीक केवल 300 माइक्रो मीटर से बड़े कणों की पहचान कर सकती है। यदि उन्नत तकनीकें इस्तेमाल होतीं तो इससे छोटे कणों की भी पहचान हो सकती थी, जिससे प्रदूषण स्तर अधिक सामने आता। जब तक माइक्रो प्लास्टिक फिल्ट्रेशन जैसी आधुनिक प्रणाली नहीं जोड़ी जाती, तब तक शुद्ध पानी का दावा अधूरा ही रहेगा।
शहर से रोजाना 350 से 400 एमएलडी सीवेज रोजाना डिस्चार्ज होता है, जिसमें से 18 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों के जरिए 204 एमएलडी सीवेज वाटर का ट्रीटमेंट कर उसे जल स्रोतों में छोड़ा जाता है। जबकि 150 से 200 एमएलडी सीवेज सीधे जलस्रोतों में मिल जाता है। इसके अलावा बड़ी झील में 36 और छोटी झील में 28 नालों से सीधे अनट्रीटेड सीवेज पहुंच रहा है। इस अनट्रीटेड सीवेज को ट्रीट करने के लिए 10 सीवेज प्लांटों की जरूरत है। जो अमृत 2.0 योजना में प्रस्तावित हैं, यह सीवेज प्लांट माता मंदिर, पंचशील नगर, चार इमली, बाणगंगा, भानपुर, समरधा होशंगाबाद रोड, अरहेड़ी और खजूरीकला में बनाए जाने हैं।
शहर के तीनों सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट सीक्वेंसिंग बैच रिएक्टर तकनीक पर चलते हैं। यह तकनीक आॅर्गेनिक कचरे को हटाने में सक्षम है, लेकिन माइक्रो प्लास्टिक फिल्टर करने के लिए डिजाइन ही नहीं की गई। परिणामस्वरूप ट्रीटेड पानी इन कणों को नदियों और वेटलैंड तक पहुंचा देता है।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह समस्या तकनीकी नहीं बल्कि स्वास्थ्य संकट है। माइक्रो प्लास्टिक मछलियों व जलीय जीवों के जरिए फूड चेन में घुस सकते हैं। स्लज के खाद के रूप में इस्तेमाल से मिट्टी में मिल सकते हैं।
आईसीएमआर की स्टडी में शहर के प्रमुख जलस्रोतों भोज वेटलैंड और बड़ी झील को लेकर चिंता जताई गई है। बड़ी झील से लगभग 40 फीसदी आबादी को पीने का पानी सप्लाई किया जाता है। एक्सपर्ट का कहना है कि यदि माइक्रो प्लास्टिक नियंत्रण नहीं हुआ तो यह सीधे मानव स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है।
यह रिसर्च राष्ट्रीय पर्यावरणीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान (आईसीएमआर) के वैज्ञानिक सूर्या सिंह और उनकी टीम ने की, जो एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित भी चुकी है।
कहां से आ रहा माइक्रो प्लास्टिक
पर्यटन व मछली पकड़ने की गतिविधियां
पर्यावरणविद डॉ. सुभाष सी पांडे बताते हैं कि आज के समय में माइक्रो और नैनो प्लास्टिक प्रदूषण एक गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट बन चुका है। आम व्यक्ति अपने जीवनकाल में कितने प्लास्टिक कण अपने शरीर में जमा कर सकता है, इस पर वैज्ञानिकों की सहमति नहीं है। ये सूक्ष्म कण इतने बारीक होते हैं कि दिखाई नहीं देते।
- जलस्रोतों की सीमा में प्लास्टिक बैग और प्लास्टिक बोतल ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।
- वाटर एक्ट 1974 की धारा 24 के तहत नगर निगम को अधिकार है कि वह जलस्रोतों को प्रदूषित करने वालों पर जुर्माना लगा सके।
-स्थानीय प्रशासन को सख्ती से निगरानी, दंड और जनजागरुकता अभियान चलाने चाहिए।
नगर निगम के पास आधुनिक जल शोधन संयंत्र और निगरानी प्रयोगशाला मौजूद हैं तथा पानी शुद्ध करके ही आपूर्ति की जाती है। अरेरा हिल्स फिल्ट्रेशन प्लांट लैब निगम के तहत एकमात्र एनएबीएल मान्यता प्राप्त फैसिलिटी है। पानी की सुरक्षा जांच को मजबूत करने के लिए अपनी अरेरा हिल्स लैबोरेटरी को अपग्रेड किया जा रहा है। नई फैसिलिटी सीवेज से फैलने वाले बैक्टीरिया जैसे हाइपोबैक्टीरिया का पता लगाने के साथ ही लैब अब पानी की सप्लाई में माइक्रो प्लास्टिक की जांच करेगी।
उदित गर्ग, सिटी इंजीनियर, नगर निगम
करंट बायोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, विश्व के महासागरों का केवल लगभग 13% (लगभग 55 मिलियन वर्ग किमी) भाग ही वास्तविक वन्य क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत है, जो मछली पकड़ने, जहाजरानी और प्रदूषण जैसे गहन मानवीय प्रभावों से मुक्त है। इस शेष समुद्री वन्य क्षेत्र का अधिकांश भाग खुले समुद्रों और ध्रुवीय क्षेत्रों में स्थित है, और लगभग कोई भी अछूता तटीय क्षेत्र शेष नहीं है। महासागर का अधिकांश भाग (87%) मानवीय गतिविधियों से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। आर्कटिक, अंटार्कटिक और दूरस्थ प्रशांत द्वीप (पैसिफिक आइलैंड)इससे प्रभावित नहीं हैं।
प्लास्टिक प्रदूषण एक गंभीर और तेजी से बढ़ता वैश्विक संकट है, जिसके चलते प्रतिवर्ष लगभग 19-23 मिलियन टन कचरा जलीय पारिस्थितिक (एक्वाटिक ईकोसिस्टम) तंत्र में प्रवेश करता है। इसका 80% से अधिक हिस्सा भूमि-आधारित स्रोतों से आता है, जो ग्रेट पैसिफिक गार्बेज पैच जैसे चक्रों में जमा हो जाता है। यह मलबा निगलने और उसमें फंसने के कारण 900 से अधिक जलीय प्रजातियों के लिए खतरा बन गया है, जिससे व्यापक स्तर पर मौतें हो रही हैं। छोड़े गए मछली पकड़ने के जाल (घोस्ट नेट) से भी अनुमानित 650,000 समुद्री जीव प्रतिवर्ष मारे जाते हैं।
समुद्री प्लास्टिक के बारे में मुख्य तथ्य
-अनुमान के अनुसार समुद्र में 75-199 मिलियन टन प्लास्टिक मौजूद है। यदि इसे साफ करने की कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो 2040 तक यह मात्रा तीन गुना हो जाएगी।
-समुद्री प्लास्टिक का लगभग 80% हिस्सा भूमि-आधारित स्रोतों (बैग, बोतलें) से आता है, जबकि ग्रेट पैसिफिक गार्बेज पैच का एक बड़ा हिस्सा मछली पकड़ने के जालों से आता है।
-जूप्लैंकटन से लेकर बड़ी व्हेल तक कई जीव प्लास्टिक का सेवन करते हैं। लगभग आधे समुद्री कछुए प्लास्टिक खा चुके हैं।
- समुद्री जीव जालों और प्लास्टिक के मलबे में फंस जाते हैं, जिससे उन्हें चोट लगती है या उनकी मृत्यु हो जाती है।
भारत में पानी से माइक्रोप्लास्टिक निकालने की तकनीक पर सक्रिय रूप से काम चल रहा है, विशेषकर शोध स्तर पर। भारतीय विज्ञान संस्थान (ककरू) बैंगलोर के वैज्ञानिकों ने एक विशेष 'हाइड्रोजेल' विकसित किया है जो यूवी प्रकाश का उपयोग करके पानी से 90% से अधिक माइक्रोप्लास्टिक को अवशोषित और नष्ट कर सकता है। यह तकनीक व्यावसायिक प्लांट के रूप में व्यापक रूप से अभी लागू नहीं है। किसी भी राज्य में ऐसे ट्रीटमेंट प्लांट नहीं हैं जो पानी से माइक्रोप्लास्टिक अलग कर सकें।
प्लास्टिक प्रदूषण पृथ्वी के सबसे गहरे बिंदु (लगभग 11,000 मीटर या 36,000 फीट) मारियाना ट्रेंच तक पहुँच चुका है, जहां 1998 के एक सर्वेक्षण में एक प्लास्टिक बैग की पहचान की गई थी। अध्ययनों से पुष्टि होती है कि गहरे समुद्र में पाए जाने वाले मलबे का 89% से अधिक हिस्सा एकल-उपयोग प्लास्टिक है, जिसमें पानी के नमूनों और गहरे समुद्र के कचरे दोनों में सूक्ष्म प्लास्टिक प्रचुर मात्रा में मौजूद है।
सीपीसीबी की 2023 की एक रिपोर्ट भारत के विभिन्न वातावरणों, जिनमें जल, वायु और जीव-जंतु शामिल हैं, में व्यापक सूक्ष्म प्लास्टिक प्रदूषण की पुष्टि करती है। रिपोर्ट में बताया गया है कि अपर्याप्त अपशिष्ट प्रबंधन और सीवेज उपचार प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं, जिससे इसके सेवन का खतरा बढ़ जाता है। सीपीसीबी निगरानी के लिए मानक पद्धतियां विकसित कर रहा है, जबकि 2018-2019 के आंकड़ों से पता चला है कि प्रति वर्ष 33 लाख टन से अधिक प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न होता है।