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भोपाल गैस त्रासदी को 41 साल बीत चुके हैं, लेकिन उस रात का ज़हर आज भी शहर और उसके लोगों का पीछा नहीं छोड़ रहा। अब उसी कचरे से निकली 899 टन जहरीली राख एक नई, बेहद खतरनाक चुनौती बनकर खड़ी है। यह सिर्फ कचरा नहीं—एक ऐसी ticking bomb है, जिसे सही तरीके से निपटाया नहीं गया तो आने वाली पीढ़ियों को इसका असर झेलना पड़ेगा।
यह राख यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के जहरीले कचरे को जलाने के बाद बनी है। मई-जून 2025 में पीथमपुर के एक ट्रीटमेंट प्लांट में कुल 337 मीट्रिक टन कचरा जलाया गया, लेकिन उसकी राख तीन गुना- 899 टन निकल आई। 55 दिनों तक यह भस्मीकरण प्रक्रिया चली, लेकिन कई महीने बीत जाने के बाद भी यह राख लीक-प्रूफ कंटेनरों में शेड के अंदर पड़ी हुई है- बिना किसी अंतिम समाधान के।
अक्टूबर में हाईकोर्ट ने सरकार की उस योजना को खारिज कर दिया जिसमें इस राख को इंसानी बस्तियों से सिर्फ 500 मीटर दूर रखने की बात कही गई थी। कोर्ट ने साफ कहा कि आबादी और जल स्रोतों से दूर नया स्थल खोजो। इसके बाद पूरी प्रक्रिया अधर में लटक गई।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी कंफ्यूज है कि आगे क्या किया जाए। एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, अक्टूबर की अचानक बारिश ने लैंडफिल बनाने में देरी कर दी। फिर कोर्ट के आदेश ने सब रोक दिया। अब नया, सुरक्षित स्थल ढूंढना पड़ सकता है, लेकिन यह लंबी प्रक्रिया है। पहली योजना थी कि नवंबर तक लैंडफिल तैयार हो जाएगा और दिसंबर तक राख दफन हो जाएगी। लेकिन अब यह असंभव लगता है।
पीथमपुर में इस निपटान का भारी विरोध हो रहा है। पीथमपुर बचाओ समिति के संयोजक हेमंत हिरोले का कहना है कि यह जगह राख दफनाने के लिए बिल्कुल सुरक्षित नहीं। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए परमाणु बम से कम नहीं। हाईकोर्ट ने साफ मना किया है—यहां निपटान नहीं होगा। सरकार को दूसरी जगह ढूंढ़नी पड़ेगी। लोगों का डर वाजिब है—जहरीली राख मिट्टी, पानी और हवा में घुलकर लंबे समय तक खतरा पैदा कर सकती है।
भोपाल गैस त्रासदी दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना थी। 41 साल बाद भी उसका जहर खत्म नहीं हुआ—और अब यह 899 टन राख भविष्य पर नया साया डाल रही है। यह सिर्फ कचरे का निपटान नहीं… बल्कि यह तय करने का इम्तिहान है कि हम फिर वही गलती दोहराएंगे या सचमुच इतिहास से कुछ सीखेंगे।