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इंदौर के भागीरथपुरा में हुई मौतों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। नल से निकला जहरीला पानी अब तक 23 लोगों की जान ले चुका है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग अब भी केवल छह मौतों को ही आधिकारिक रूप से स्वीकार कर रहा है। दूसरी ओर, एमजीएम मेडिकल कॉलेज के पांच वरिष्ठ चिकित्सकों की कमेटी द्वारा तैयार की गई डेथ एनालिसिस रिपोर्ट ने सरकारी दावों की पोल खोल दी है।
15 लोगों की मौत का सीधा कारण दूषित पानी-
रिपोर्ट के अनुसार 21 मृतकों में से 15 लोगों की मौत का सीधा कारण दूषित पानी माना गया है, जबकि छह मौतों की पुष्टि दूषित पानी और डायरिया से हुई है। नौ अन्य मामलों में भी संभावित कारण यही सामने आया है, वहीं दो मृतकों पर कमेटी किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी, जिनमें से एक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अब तक इंतजार किया जा रहा है। इसके अलावा, चार मृतकों की मौत को कमेटी ने डायरिया से जोड़ने से इनकार किया है, जिससे यह साफ हो गया है कि हालात जितने बताए जा रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा भयावह हैं।
21 मृतकों में से 18 मृतकों के परिजनों को रेडक्रास से दी आर्थिक सहायता
एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डॉ. संजय दुबे, डॉ. सुराज साहू, डॉ. अखिलेश, डॉ. हिमांशु और डॉ. सुनील सोनी की इस कमेटी ने पूरे 12 दिनों तक मृतकों के इलाज से जुड़े दस्तावेजों, संबंधित चिकित्सकों और परिजनों से बातचीत कर यह रिपोर्ट तैयार की है। सोमवार को यह रिपोर्ट कॉलेज के डीन को सौंपी गई, लेकिन सवाल यह है कि इतनी गंभीर रिपोर्ट को अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया। प्रशासन ने अब तक 21 मृतकों में से 18 मृतकों के परिजनों को रेडक्रास सोसायटी के माध्यम से दो-दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी है, जबकि शेष तीन मामलों में अभी प्रक्रिया चल रही है। यह सहायता राहत से ज्यादा प्रशासन की मजबूरी और जिम्मेदारी से बचने का प्रतीक बनती जा रही है।
अब एमजीएम मेडिकल कॉलेज यह रिपोर्ट कलेक्टर और संभागायुक्त को सौंपेगा, जिसके बाद इसे राज्य सरकार तक भेजा जाएगा, लेकिन जनता को डर है कि कहीं यह रिपोर्ट भी फाइलों में दबाकर दोषियों को बचाने का जरिया न बन जाए। इसी बीच इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की टीम ने भी अपनी जांच रिपोर्ट भोपाल में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को सौंप दी है, लेकिन उस रिपोर्ट की सच्चाई भी अब तक परदे के पीछे है। सवाल साफ है—जब मौतें सामने हैं, रिपोर्टें तैयार हैं, तो फिर जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं? क्या भागीरथपुरा की यह त्रासदी भी केवल आंकड़ों और कागजों में सिमटकर रह जाएगी, या कभी किसी की कुर्सी हिलाएगी?