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क्या हमारी थाली में घुल रहा जहर?यूरोप में बैन कीटनाशक अब भी भारतीय खेतों में, कैंसर और गंभीर बीमारियों का बढ़ रहा खतरा

यूरोप और कई देशों में प्रतिबंधित कीटनाशक भारत में अब भी इस्तेमाल हो रहे हैं। विशेषज्ञों का दावा है कि पैराक्वाट, ग्लाइफोसेट और 2,4-डी जैसे रसायन कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं। सवाल यह है कि क्या भारतीयों की थाली तक खतरनाक केमिकल पहुंच रहे हैं?
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यूरोप में बैन कीटनाशक अब भी भारतीय खेतों में, कैंसर और गंभीर बीमारियों का बढ़ रहा खतरा

भारत में खेती को ज्यादा उत्पादक बनाने के लिए वर्षों से रासायनिक कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। लेकिन अब इन्हीं रसायनों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जिन केमिकल्स को यूरोप और दुनिया के कई देशों ने स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरनाक मानते हुए प्रतिबंधित कर दिया है, उनका इस्तेमाल भारत के खेतों में आज भी बड़े पैमाने पर हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन रसायनों का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह फसलों के जरिए हमारी थाली तक पहुंच सकता है।  कृषि और पर्यावरण क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल खेती का मुद्या नहीं, बल्कि सभी के स्वास्थ्य से जुड़ा बड़ा सवाल है। खासकर तब, जब कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।

यूरोप में प्रतिबंध, भारत में खुलेआम इस्तेमाल

कई ऐसे कीटनाशक और खरपतवारनाशक हैं जिन पर दुनिया के अनेक देशों में रोक लग चुकी है। इनमें पैराक्वाट, ग्लाइफोसेट, 2,4-डी, एसेफेट और डाइमेथोएट जैसे रसायन शामिल हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर अनुसंधान एजेंसी (आईएआरसी) इनमें से कई रसायनों को संभावित कैंसरकारी श्रेणी में रख चुकी है। इसके बावजूद भारत में इनका इस्तेमाल जारी है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि लागत कम होने और आसानी से उपलब्ध होने के कारण किसान इन रसायनों का उपयोग करते हैं। हालांकि इनके दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर लगातार चिंताएं सामने आ रही हैं।

पैराक्वाट को लेकर सबसे ज्यादा चिंता

पैराक्वाट दुनिया के सबसे विवादित खरपतवारनाशकों में से एक माना जाता है। यह रसायन अत्यधिक जहरीला माना जाता है और यूरोपीय संघ ने वर्ष 2007 में इसके कृषि उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था। वर्तमान में दुनिया के 70 से अधिक देशों में इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार पैराक्वाट की थोड़ी मात्रा भी इंसान के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है। इसके संपर्क में आने से फेफड़ों को गंभीर नुकसान, किडनी फेल होने और पार्किंसंस जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारी का खतरा बढ़ सकता है। कृषि विशेषज्ञ और ‘किसान तक’ के संपादक ओम प्रकाश का कहना है कि इस कीटनाशक पर देशव्यापी प्रतिबंध लगाने की मांग लंबे समय से उठ रही है। उनके अनुसार इस संबंध में एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है।

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ग्लाइफोसेट पर दुनिया भर में बहस

ग्लाइफोसेट एक ऐसा खरपतवारनाशक है जिसका उपयोग दुनिया भर में सबसे ज्यादा किया जाता है। इसे पहली बार अमेरिकी कंपनी मोनसेंटो ने ‘राउंडअप’ नाम से बाजार में उतारा था। वर्ष 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर एजेंसी ने इसे ‘संभावित कैंसरकारी’ श्रेणी में रखा था। इसके बाद दुनिया के कई देशों में इस पर बहस शुरू हो गई। हालांकि कुछ नियामक एजेंसियां इसे सुरक्षित बताती हैं, लेकिन इस रसायन को लेकर हजारों कानूनी विवाद सामने आए हैं। मोनसेंटो का अधिग्रहण करने वाली कंपनी बायर को कैंसर संबंधी दावों के निपटारे के लिए अरबों डॉलर का भुगतान करना पड़ा था। ओम प्रकाश का कहना है कि भारत में भी इस रसायन के इस्तेमाल को लेकर गंभीर समीक्षा की जरूरत है। उनका मानना है कि केवल कंपनियों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के आधार पर किसी रसायन को पूरी तरह सुरक्षित मान लेना उचित नहीं होगा।

वियतनाम युद्ध से जुड़ा है 2,4-डी का इतिहास

2,4-डी नामक रसायन को लेकर भी लंबे समय से विवाद बना हुआ है। यह वही रसायन है जो वियतनाम युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए कुख्यात ‘एजेंट ऑरेंज’ का एक प्रमुख हिस्सा था। उस युद्ध के दशकों बाद भी इसके दुष्प्रभावों पर शोध जारी है। भारत में 2,4-डी का उपयोग गेहूं, धान, मक्का और गन्ने जैसी फसलों में खरपतवार नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। वर्ष 2015 में इसे भी संभावित कैंसरकारी श्रेणी में रखा गया था। हालांकि इसके उपयोग पर भारत में अभी कोई व्यापक प्रतिबंध नहीं है।

मधुमक्खियों और पर्यावरण के लिए भी खतरा

विशेषज्ञों की चिंता केवल इंसानी स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। एसेफेट जैसे कीटनाशकों को लेकर वैज्ञानिकों ने पर्यावरणीय खतरे की भी चेतावनी दी है। शोध बताते हैं कि यह रसायन मधुमक्खियों, तितलियों और अन्य परागण करने वाले कीड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है। मधुमक्खियां कृषि उत्पादन की रीढ़ मानी जाती हैं क्योंकि कई फलों, सब्जियों और तिलहन फसलों का उत्पादन इनके परागण पर निर्भर करता है। यदि इनकी संख्या लगातार घटती है तो कृषि उत्पादन पर भी सीधा असर पड़ सकता है। इसके बावजूद एसेफेट का इस्तेमाल कपास, दालों और सब्जियों की खेती में बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सस्ते विकल्प होने के कारण किसान अभी भी इन रसायनों पर निर्भर हैं।

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यूरोप ने लौटाए सैकड़ों भारतीय उत्पाद

खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता तब और बढ़ जाती है जब निर्यात से जुड़े आंकड़े सामने आते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार मई 2024 से मई 2026 के बीच यूरोपीय संघ के सदस्य देशों ने भारत से भेजे गए 365 कृषि उत्पादों को अस्वीकार कर दिया। इन उत्पादों में कीटनाशकों और भारी धातुओं के अवशेष पाए गए थे। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल निर्यात का मामला नहीं है। इससे बड़ा सवाल यह है कि जिन उत्पादों को दूसरे देश स्वीकार नहीं कर रहे, वे भारतीय उपभोक्ताओं की थाली तक किस स्तर पर पहुंच रहे हैं।

कैंसर के बढ़ते मामलों के बीच चिंता

भारत में कैंसर पहले से ही एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अनुसार वर्ष 2022 में देश में करीब 14.6 लाख नए कैंसर मरीज सामने आए थे। सरकारी अनुमान बताते हैं कि आने वाले वर्षों में यह संख्या और बढ़ सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह नहीं कहते कि केवल एक कीटनाशक कैंसर का कारण बनता है, क्योंकि इसके पीछे कई कारक जिम्मेदार होते हैं। लेकिन उनका मानना है कि जिन रसायनों को संभावित या संभव कैंसरकारी माना गया है, उनके संपर्क को यथासंभव कम किया जाना चाहिए।

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अब नीति निर्माताओं के सामने बड़ा सवाल

कृषि क्षेत्र से जुड़े कई लोग यह तर्क देते हैं कि इन रसायनों के बिना फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है और किसानों की लागत बढ़ सकती है। दूसरी तरफ स्वास्थ्य विशेषज्ञ और पर्यावरणविद यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि दुनिया के कई विकसित देश इन रसायनों को जोखिमपूर्ण मानकर प्रतिबंधित कर चुके हैं, तो भारत में इनके उपयोग को लेकर सख्त समीक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए।

Sona Rajput
By Sona Rajput

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन किया है। साल 2022 ...Read More

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