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एक ही दिन, अलग-अलग नाम..!भारत के राज्यों में बैसाखी पर्व का चौंकाने वाला रूप

बैसाखी 2026 सिर्फ एक पारंपरिक त्योहार नहीं, बल्कि भारत की कृषि संस्कृति, आस्था और नई शुरुआत का भव्य उत्सव है। यह पर्व हर साल मेष संक्रांति के अवसर पर मनाया जाता है, जब सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करता है। इस दिन किसान अपनी मेहनत की फसल काटकर खुशी मनाते हैं और प्रकृति का आभार प्रकट करते हैं।
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भारत के राज्यों में बैसाखी पर्व का चौंकाने वाला रूप
Ai Generated
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    बैसाखी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि खेती, आस्था और संस्कृति का एक बड़ा उत्सव है। हर साल अप्रैल के महीने में जब खेतों में फसल पककर तैयार होती है, तब यह पर्व पूरे उत्तर भारत में उमंग और ऊर्जा लेकर आता है। 2026 में भी बैसाखी का रंग पूरे देश में अलग ही देखने को मिला कहीं ढोल-नगाड़ों की थाप, तो कहीं गुरुद्वारों में अरदास और लंगर की सेवा।

    यह पर्व खास तौर पर पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत की लोक परंपरा से जुड़ा हुआ है, लेकिन इसकी खुशबू पूरे देश में महसूस की जाती है।

    अलग-अलग राज्यों में अलग नाम

    भारत में यह पर्व अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। असम में इसे बोहाग बिहू कहते हैं, बंगाल में पोइला बैशाख, केरल में विशु और हरियाणा-पंजाब में बैसाखी। हर जगह इसका रूप अलग है लेकिन भावना एक ही है नई शुरुआत और समृद्धि।

    मेष संक्रांति से जुड़ा पर्व

    बैसाखी तब मनाई जाती है जब सूर्य मीन राशि से निकलकर मेष राशि में प्रवेश करता है। इसी को मेष संक्रांति कहा जाता है। यह दिन नए सौर वर्ष की शुरुआत जैसा माना जाता है।

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    किसानों की खुशी का त्योहार

    यह पर्व किसानों के लिए सबसे खास होता है। रबी की फसल पककर तैयार हो जाती है और कटाई शुरू होती है। किसान अपनी मेहनत के फल को देखकर खुशी से झूम उठते हैं और प्रकृति का धन्यवाद करते हैं।

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    सिख धर्म में ऐतिहासिक दिन

    बैसाखी का सिख धर्म में बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि इसी दिन 1699 में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। यह दिन साहस, समानता और एकता का प्रतीक माना जाता है।

    गुरुद्वारों में विशेष आयोजन

    इस दिन गुरुद्वारों में कीर्तन, अरदास और लंगर का आयोजन होता है। श्रद्धालु मत्था टेककर आशीर्वाद लेते हैं और सेवा भाव में हिस्सा लेते हैं।

    लोक नृत्य और संगीत की रौनक

    पंजाब में बैसाखी का मतलब ही है भांगड़ा और गिद्दा। ढोल की थाप पर लोग नाचते-गाते हैं और खुशी का माहौल हर तरफ फैल जाता है।

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    स्नान और दान की परंपरा

    उत्तर भारत में लोग इस दिन पवित्र नदियों और सरोवरों में स्नान करते हैं। माना जाता है कि इससे मन और शरीर दोनों शुद्ध होते हैं।

    सूर्य उपासना का महत्व

    इस दिन सूर्य देव की पूजा का विशेष महत्व है। लोग सूर्य को अर्घ्य देते हैं और सूर्याष्टक या आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करते हैं।

    दान-पुण्य की परंपरा

    बैसाखी पर दान को बहुत शुभ माना गया है। लोग अनाज, गुड़, सत्तू और पानी का दान करते हैं। यह माना जाता है कि इससे जीवन में समृद्धि आती है।

    नई शुरुआत का प्रतीक

    बैसाखी सिर्फ फसल का नहीं, बल्कि जीवन में नई ऊर्जा और नए संकल्पों का पर्व है। यह हमें सिखाता है कि मेहनत का फल जरूर मिलता है और हर अंत एक नई शुरुआत लेकर आता है।

    Garima Vishwakarma
    By Garima Vishwakarma

    गरिमा विश्वकर्मा | People’s Institute of Media Studies से B.Sc. Electronic Media की डिग्री | पत्रकार...Read More

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