भोपाल। सामान्य प्रसव के दौरान महिलाओं को असहनीय पीड़ा से गुजरना पड़ता हैं, लेकिन अब महिलाएं कम दर्द में हुए बच्चे को जन्म देंगी। यही नहीं प्रसव के लिए महिलाएं उस पोजिशन को चुन सकेंगी जिसमें उन्हें दर्द सबसे कम हो। दरअसल, महिलाओं को प्रसव के दौरान होने वाले दर्द से बचाने के लिए हमीदिया अस्पताल (गांधी मेडिकल कॉलेज) में नई पहल की गई है। इसे आर्ट ऑफ बर्थिंग नाम दिया गया है। आर्ट ऑफ बर्थिंग की शुरुआत जीएमसी की स्त्री रोग विभाग की एचओडी डॉ. शबाना सुल्तान द्वारा की गई है।
मालूम हो कि प्रसव के दर्द को दुनिया के तीव्र दर्द में से एक माना जाता है। चिकित्सीय भाषा में कहें तो मानव शरीर 45 डेल (दर्द नापने की इकाई) से ज्यादा दर्द सहन नहीं सकता है लेकिन प्रसव के दौरान दर्द 57 डेल तक पहुंच जाता है। डॉक्टरों की माने तो इस दर्द के डर के कारण कई महिलाएं सीजेरियन तक करा रही है। इसी दर्द से बचाने जीएमसी में आर्ट ऑफ बर्थिंग की शुरूआत की गई है।
डॉ. शबाना सुल्तान का कहना है कि सामान्य प्रसव के बारे में माना जाता है कि यह पीठ के बल लेट कर ही होता है। आर्ट ऑफ बर्थिंग में इसके लिए अल्टरनेटिव पोजीशन का उपयोग होता है, यानि मां सुविधा अनुसार स्थितियों में बच्चे को जन्म दे सकती है। इसमें कुर्सी पर बैठकर, घुटनों के बल झुककर या सहारा लेकर खड़े होकर डिलीवरी करना शामिल है। हालांकि हमीदिया में फिलहाल कुर्सी पर बैठकर ही डिलेवरी की शुरूआत की गई है। आने वाले समय में अन्य पोजिशन पर भी काम शुरू होगा।
जानकारी के अनुसार लेबर रूम को भी नए सिरे से तैयार किया गया है। डिलेवरी के दौरान महिलाओं की मनपसंद खुशबू का उपयोग किया जाता है। इसे अरोमा थैरेपी कहा जाता है। इसके साथ ही मनपसंद संगीत भी चलाया जाता है। मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. रुचि सोनी के मुताबिक मनपसंद खुशबू और सगीत से व्यक्ति मानसिक रूप से तनाव मुक्त रहता है। ऐसे में उसे दर्द का अनुभव भी कम होता है।
जल्द ही यहां वॉटर बर्थ सुविधा शुरू की जाएगी। इसमें प्रसव एक गुनगुने पानी के टब में की जाती है, जो एक प्राकृतिक और कम दर्दनाक विकल्प है। यह प्रक्रिया मांसपेशियों को लचीला बनाती है जिससे प्रसव के दौरान दर्द का अनुभव कम होता है।
आर्ट ऑफ बर्थिंग के तहत लेबर रूम का कायाकल्प किया गया है। इसका उद्देश्य प्रसव के लिए सुरक्षित, गरिमापूर्ण और तनावमुक्त वातावरण तैयार करना है। हमारी कोशिश है कि हर मां यहां से एक सुखद अनुभव लेकर घर जाए।
डॉ. कविता एन सिंह, डीन गांधी मेडिकल कॉलेज