इंदौर। यदि आपकी एक किश्त लेट हो जाए तो बैंक आपको फोन पर, मैसेज में और नोटिस के जरिए चैन से जीने नहीं देता. यह आम सच्चाई है। लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब सभी किश्तें समय पर चुकाने वाला ईमानदार ग्राहक ही बैंक की दादागिरी का शिकार बना दिया जाए। यही शर्मनाक तस्वीर एक बार फिर सामने आई है, जहाँ बैंक की गलती, लापरवाही और अंदरूनी अव्यवस्था का खामियाजा सीधे ग्राहक को भुगतने की धमकी देकर वसूला जा रहा है।
कंपनियों की गुंडागर्दी -
मीडिया पहले भी निजी बैंकों और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों की रिकवरी गुंडागर्दी, फोन पर धमकी, मानसिक प्रताड़ना और ग्राहकों को अपराधी समझने की मानसिकता को उजागर करता रहा है। उन खुलासों को नज़रअंदाज़ करने का ही नतीजा है कि आज फिर वही कहानी, वही बैंक और वही अहंकार इंदौर में देखने को मिला। मामला सेंट्रम हाउसिंग फाइनेंस से जुड़ा है। एक ऐसी निजी हाउसिंग फाइनेंस कंपनी, जिस पर देशभर में ग्राहकों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के आरोप पहले भी सामने आ चुके हैं। इंदौर में रहने वाले एक ग्राहक, जो वर्षों से नियमित रूप से अपनी हर किश्त समय पर जमा करता आ रहा है, उसे अचानक बैंक से धमकी भरे फोन आने लगे।
ग्राहक ने बेहद शालीनता से जवाब दिया कि नोटिस कोर्ट से आया है, आप अपने वकील से बात करें। लेकिन यहीं से बैंक अधिकारी का असली चेहरा सामने आ गया। फोन पर भाषा बदली, लहजा बदला और फिर शुरू हुई सीधी धमकी। कर्मचारी ने कहा “तुझे समझ नहीं आ रही, कैसे बात कर रहा है?” ग्राहक बार-बार स्पष्ट करता रहा कि ना तो कोई किश्त बाउंस है, ना ही कोई रकम पेंडिंग है। इसके बावजूद बैंक अधिकारी का अहंकार और बौखलाहट इतनी बढ़ गई कि उसने ग्राहक को ऑफिस बुलाकर ‘देख लेने’ की खुली धमकी दे डाली।
मीडिया पहले भी यह सवाल उठाता रहा है कि रिकवरी के नाम पर बैंक अधिकारी कानून को जेब में रखकर बात करते हैं, लेकिन नियामक संस्थाएं और प्रशासन आंखें मूंदे बैठे रहते हैं। यही कारण है कि आज विजय नगर जैसे पॉश इलाके में भी ग्राहक को थाने की शरण लेनी पड़ी। पीड़ित ग्राहक ने पूरे घटनाक्रम की लिखित शिकायत विजय नगर थाने में दर्ज कराई है और बैंक कर्मचारी राहुल यादव के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है।
5 साल तक नियमित किस्त भरने के बावजूद मूलधन घटा ही नहीं! इंदौर की रहने वाली पीड़ित महिला ग्राहक ने बताया वह पांच साल तक नियमित रूप से अपनी किस्त भरती रहीं, लेकिन मूलधन में एक रुपए की भी कमी नहीं हुई। बैंक ने 13% की ब्याज दर लिखी थी, लेकिन धोखे से कभी 14% तो कभी 14.5% तक ब्याज वसूला। लोन स्टेटमेंट मांगने पर बैंक अधिकारी उसे जानकारी देने से बचते रहे। इतना ही नहीं, जब वह आरबीआई के रेपो रेट का हवाला देकर ब्याज कम करने की बात करती तो बैंक अधिकारी टालमटोल करते।
मामला पांच माह से उपभोक्ता फोरम में दर्ज है, लेकिन बैंक प्रबंधन जवाब देने के बजाय टालमटोल कर रहे हैं। पीड़ित ग्राहक की शिकायत के आधार पर जब उपभोक्ता फोरम में आवेदन दाखिल किया तो उम्मीद थी कि अब बैंक की तरफ से जवाब आएगा, लेकिन सेंट्रम हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड की असलियत तब सामने आई, जब पांच महीने बाद भी न तो बैंक की ओर से किसी वकील ने जवाब दाखिल किया और न ही बैंक का कोई प्रतिनिधि उपस्थित हुआ। कोर्ट द्वारा बार-बार समन जारी किए जाते रहे, लेकिन हर बार एक ही बहाना कि पते पर कोई व्यक्ति नहीं मिला या पता गलत है। अब बड़ा सवाल यह है कि अगर एक बैंक का पता ही सही नहीं है तो ऐसे बैंक देश में काम कैसे कर रहे हैं? यह हैरानी की बात है कि करोड़ों का कारोबार करने वाले बैंक खुद अपने पते से ही गायब पाए जाएं। निजी बैंकों की इस चालाकी से पहले भी न जाने कितने ग्राहकों की जीवनभर की कमाई हड़पी जा चुकी है।