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भोपाल। गैस त्रासदी के 41 वर्ष बीतने के बाद भी प्रत्यक्षदर्शी उस रात के बारे में सोचकर ही घबरा जाते हैं। मौत की उस हवा से बचकर निलकना हर किसी को नसीब हुआ। जो लोग रातों रात दूर चले गए उन्हें राहत मिली। हालांकि आखों की जलन से अस्पताल पहुंचने पर और भयावह नजारा देखने को मिला। ऐसा ही वाकया प्रत्यक्षदर्शी कवि महेश अग्रवाल ने बताया।
महेश अग्रवाल ने बताया कि 'एक हफ्ते बाद घर में शादी होने वाली थी। हमारा घर उन दिनों लखेरापुरा में था। दो-तीन दिसंबर की रात करीब दो ढाई बजे के दरमियान का वाकया है। घर में सभी सो रहे थे। अचानक ऐसा लगा जैसे मिर्च की धांस तेजी से आ रही है। सभी की नींद खुल गई। दरवाजा खोला तो लगा, कहीं किसी ने बड़ी मात्रा में मिर्च जला दी है। उन दिनों हमारा मिर्च कारोबारी पड़ोसी से विवाद चल रहा था। फिर शोर सुनाई दिया, लोग कह रहे थे.... गैस निकली है...भागो। परिवार को लेकर वहां से पैदल-पैदल निकल पड़े। मेरा और मेरे भाई का परिवार साथ था। बहनें भी साथ थीं। सभी तेजी से चलते हुए कमलापार्क होते हुए पॉलीटेक्निक पहुंचे। यहां डॉ.एनपी मिश्रा के बंगले के पास आकर बैठ गए।'
अग्रवाल ने बताया 'आंखों में जलन हो रही थी। इस बीच ऐसा लग रहा था कि जिंदगी बचेगी या नहीं। मैंने अपने भाई से कहा-लाओ ...गुटखा दो, पता नहीं कब तक है जिंदगी। हम हमीदिया अस्पताल पहुंचे। यहां डॉक्टर इतने बिजी थे कि स्वेटर के ऊपर से ही इंजेक्शन लगा रहे थे। एक आदमी तो मर्च्युरी का कांच फोड़कर बाहर कूदकर भागा था। यह देखकर हम घबरा गए।'
यूनियन कार्बाइड के कर्मचारी रहे वीके अवस्थी ने बताया कि 'मैं यूनियन कार्बाइड में ही काम करता था। दो-तीन दिसंबर की रात को अपना काम निपटाकर घर पहुंचा। रात करीब 12.30 बजे आंखों में जलन होने लगी, तभी फोन की घंटी बजी। कॉल कंपनी से आया था। तो मैं घबरा गया। बताया गया कि वहां गैस रिसाव हुआ है। रात करीब 2.30 बजे मैं अपने बॉस के साथ कार से फैक्ट्री पहुंचा।लोगों को बाहर निकालना शुरू किया। गैस का रिसाव फैक्ट्री के अंदरूनी हिस्से में ऊपर की ओर हुआ था। गैस का प्रभाव फैक्ट्री के अंदर की बजाय बाहर ज्यादा था। जो लोग गैस की चपेट में आकर शुरुआत में गिर गए, वह बच गए। जो लोग दौड़ते रहे वे ज्यादा प्रभावित हो गए।'