मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति वार्ता अब अनिश्चितता के घेरे में आ गई है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होने वाली इस अहम बैठक से पहले ही घटनाक्रम तेजी से बदलने लगे हैं। पाकिस्तान में ईरान के राजदूत रजा अमीरी मोगदम द्वारा सोशल मीडिया पोस्ट डिलीट किए जाने के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या ईरान का प्रतिनिधिमंडल वास्तव में बातचीत के लिए इस्लामाबाद पहुंचेगा या नहीं। इस घटनाक्रम ने न केवल सीजफायर की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया में फिर से तनाव बढ़ने की आशंका भी पैदा कर दी है।
पाकिस्तान में ईरान के राजदूत रजा अमीरी मोगदम ने गुरुवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर की गई एक पोस्ट को अचानक डिलीट कर दिया। इस पोस्ट में उन्होंने जानकारी दी थी कि ईरान का प्रतिनिधिमंडल अमेरिका के साथ बातचीत के लिए इस्लामाबाद पहुंचने वाला है।
पोस्ट में यह भी कहा गया था कि, लेबनान में इजरायल द्वारा संघर्ष-विराम उल्लंघन के बावजूद ईरान गंभीर बातचीत के लिए इस्लामाबाद आने को तैयार है। लेकिन कुछ ही समय बाद यह पोस्ट हटा दी गई। पोस्ट हटाए जाने के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या ईरान वास्तव में वार्ता में शामिल होगा या फिर यह अमेरिका पर दबाव बनाने की रणनीति है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू सामने आया है। ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघर गालिबाफ ने पहले ही कहा था कि लेबनान में संघर्ष-विराम उल्लंघन के कारण अमेरिका के साथ बातचीत करना अतार्किक है। यानी एक ओर ईरानी राजदूत बातचीत की संभावना जता रहे थे, वहीं दूसरी ओर देश के शीर्ष नेता इस पर सवाल उठा रहे थे। ऐसे में पोस्ट हटाने के बाद यह संकेत मिल रहे हैं कि ईरान के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद मौजूद हैं।
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इसी बीच तेहरान के मेयर अलीरजा जकानी ने अमेरिका के साथ वार्ता को पूरी तरह बेकार बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि, अमेरिका ने पहले भी कई बार संघर्ष-विराम से जुड़े वादे तोड़े हैं और उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जकानी ने ईरान के संस्थापक नेता रूहोल्लाह खोमैनी की उस चेतावनी का भी जिक्र किया जिसमें कहा गया था कि अमेरिका पर भरोसा करना खतरनाक हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि, ईरानी लड़ाकों के हाथ खुले हैं और वे जरूरत पड़ने पर कड़ा जवाब दे सकते हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच यह वार्ता 10 अप्रैल 2026 से पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शुरू होने वाली थी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दोनों देशों को आमंत्रित किया है और खुद को मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत किया है। इस बैठक का उद्देश्य 8 अप्रैल को घोषित दो सप्ताह के युद्धविराम को स्थायी शांति समझौते में बदलना बताया गया था।
ईरान इस बातचीत में अपनी 10 सूत्रीय शांति योजना को आधार बनाकर शामिल होने की बात कर रहा है। अमेरिका ने इस प्रस्ताव को काम करने लायक आधार बताया है, लेकिन कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं।
इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं-
इन्हीं मुद्दों के कारण बातचीत शुरू होने से पहले ही हालात जटिल होते जा रहे हैं।
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ईरान के परमाणु एजेंसी प्रमुख मोहम्मद इस्लामी ने भी गुरुवार को बड़ा बयान दिया। उन्होंने साफ कहा कि, यूरेनियम संवर्धन का अधिकार ईरान के लिए अनिवार्य शर्त है और इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इस्लामी के मुताबिक, अमेरिका ने ईरान की 10 सूत्रीय योजना के तीन अहम बिंदुओं का उल्लंघन किया है।
उन्होंने तीन प्रमुख आरोप लगाए-
उन्होंने कहा कि, इन परिस्थितियों में अमेरिका पर भरोसा करना मुश्किल है।
सीजफायर की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद इजरायल ने लेबनान की राजधानी बेरूत पर हमले किए। रिपोर्ट्स के मुताबिक इन हमलों में 250 से अधिक लोग मारे गए। ईरान का कहना है कि, युद्धविराम में लेबनान भी शामिल था, जबकि अमेरिका और इजरायल का कहना है कि यह समझौता केवल ईरान-अमेरिका संघर्ष तक सीमित है। इस मुद्दे ने वार्ता से पहले ही विवाद को और गहरा कर दिया है।
दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल व्यापार के लिए अहम होर्मुज जलडमरूमध्य भी इस संकट का केंद्र बन गया है। ईरान ने सीजफायर के बावजूद इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण बनाए रखा है और कथित तौर पर यहां लैंड माइंस बिछाने का दावा किया है। ईरान ने चेतावनी दी है कि, अगर टैंकर निर्धारित मार्ग से हटकर गुजरते हैं तो बड़ी दुर्घटना हो सकती है। इस समय होर्मुज में सैकड़ों तेल और गैस टैंकर फंसे हुए बताए जा रहे हैं।
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होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव का असर वैश्विक बाजारों पर भी पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगभग 98 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। यह युद्ध शुरू होने के बाद से करीब 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी मानी जा रही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान को सख्त चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि, अगर ईरान ने समझौते की शर्तों का पालन नहीं किया तो उसे पहले से भी ज्यादा घातक सैन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। यह बयान ऐसे समय आया है जब शांति वार्ता की संभावना पर ही सवाल उठने लगे हैं।
28 फरवरी से शुरू हुए इस संघर्ष को रोकने के लिए घोषित युद्धविराम फिलहाल बेहद नाजुक स्थिति में दिखाई दे रहा है। लेबनान हमले, परमाणु कार्यक्रम, होर्मुज जलडमरूमध्य और कूटनीतिक मतभेद इन सभी मुद्दों ने वार्ता से पहले ही माहौल को तनावपूर्ण बना दिया है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस्लामाबाद में प्रस्तावित बैठक पर टिकी हैं।