MP में मौजूद एक ऐसा मंदिर :जहां श्रद्धालु भगवान के बनते हैं माता- पिता, बोली भी लगती है, क्या है पूरी प्रथा?

भगवान के माता-पिता बनने वाले श्रद्धालुओं को अपने व्यवहार और दिनचर्या में विशेष बदलाव करना पड़ता है। उन्हें संयम, नियम और धार्मिक आचरण का पालन करना होता है, तभी वे इस भूमिका के योग्य माने जाते हैं।
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जहां श्रद्धालु भगवान के बनते हैं माता- पिता, बोली भी लगती है, क्या है पूरी प्रथा?
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    भारत जो भूमि है संस्कृति, आस्था और अलग- अलग त्याहारों की। यहां मंदिर में सिर्फ पूजा नहीं होती बल्कि भक्त अपनी सच्ची श्रध्दा इसलिए भी रखते हैं क्योंकि उन्हें अपने भगवान पर पूरा भरोसा होता है। लेकिन इसके अलावा कई लोग अक्सर कई मान्याएं पर भी यकीन रखते हैं, जो उन्हें आध्यात्मित चीजों के बारे में जानकारी देते हैं। लेकिन मध्य प्रदेश के खंडवा में एक ऐसा जैन मंदिर है जहां श्रध्दालु सिर्फ भगवान की पूजा नहीं करते, बल्कि भगवान के माता- पिता बनने के लिए सिर्फ प्रार्थनाएं नहीं बल्कि बोली भी लगाते हैं।

    क्या है जैन समाज की परंपरा?

    ये परंपराए अक्सर हम किसी कपल्स से सुनते हैं जो माता- पिता बनने के लिए कई मन्नतें रखते हैं। लेकिन खंडवा में चली आ रही 45 साल पुरानी इस परंपरा सुनकर आपको भी हैरानी होगी। क्योंकि यहां भगवान के माता- पिता बनने के लिए कई लोग बढ़ चढ़कर आगे आते हैं और बोली लगाते हैं। लेकिन यह परंपरा सुनने में जीतनी आसान दिख रही है वैसी है नहीं।

    खंडवा में हो रहा खास आयोजन

    खंडवा स्थित 45 साल पुराने महावीर दिगंबर जैन मंदिर में पांच दिन की भव्य पंचकल्याणक महोत्सव का आयोजन होने जा रहा है। बता दें यह आयोजन घासपुरा क्षेत्र में मुनिश्री आदित्य सागर महाराज के नेतृत्व में होगा। पंचकल्याणक जैन धर्म का एक खास और महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान होता है। इस प्रथा में भगवान की पाषाण प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है।

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    पर्ची और बोली के जरिए शामिल होते हैं श्रद्धालु

    जैन समाज के पंचकल्याणक महोत्सव में एक ऐसी अनूठी परंपरा देखने को मिलती है, जहां श्रद्धालु भगवान के माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। इस चयन प्रक्रिया में समाज के लोग पर्चियों और बोली के माध्यम से हिस्सा लेते हैं। कई श्रद्धालु पहले से ही अपनी इच्छा जताते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय गुरु और समाज की परंपरा के अनुसार ही लिया जाता है। जैन समाज में यह अवसर केवल सम्मान नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक माना जाता है। इसके लिए व्यक्ति को अपने जीवन में अनुशासन, त्याग और सात्विकता अपनानी होती है।

    आसान नहीं है प्रक्रिया

    भगवान के माता-पिता बनने वाले श्रद्धालुओं को अपने व्यवहार और दिनचर्या में विशेष बदलाव करना पड़ता है। उन्हें संयम, नियम और धार्मिक आचरण का पालन करना होता है, तभी वे इस भूमिका के योग्य माने जाते हैं। यह परंपरा समाज में भक्ति, समर्पण और आस्था की गहराई को दर्शाती है, जहां व्यक्ति खुद को भगवान की सेवा में पूर्ण रूप से समर्पित करता है।

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    इंद्र दरबार में सजती है आस्था की झांकी

    पंचकल्याणक महोत्सव के दौरान पांच दिनों तक विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं, जिनमें भगवान के जीवन के पांच प्रमुख कल्याणकों का वर्णन होता है। इस दौरान इंद्र दरबार सजता है, जहां इंद्र-इंद्राणी बनने का भी अवसर श्रद्धालुओं को मिलता है। इस आयोजन में समाज के लोग उत्साह के साथ भाग लेते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार बोली लगाते हैं।

    लाखों की बोली में दिखती अटूट श्रद्धा

    जैन समाज के सचिव सुनील जैन के अनुसार, इंद्र-इंद्राणी बनने के लिए कई बार लाखों रुपये तक की बोली लगाई जाती है। यह बोली केवल धन का प्रदर्शन नहीं, बल्कि आस्था और समर्पण का प्रतीक होती है। इस बार आयोजन को लेकर पूरे निमाड़ क्षेत्र में खासा उत्साह है और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसमें भाग लेने के लिए आगे आ रहे हैं।

    निमाड़ क्षेत्र में उत्साह का माहौल

    पंचकल्याणक महोत्सव को लेकर पूरे निमाड़ क्षेत्र में धार्मिक वातावरण बना हुआ है। श्रद्धालु न केवल अनुष्ठानों में भाग ले रहे हैं, बल्कि सेवा कार्यों में भी बढ़-चढ़कर योगदान दे रहे हैं। यह आयोजन समाज को एक सूत्र में बांधने के साथ-साथ आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार भी कर रहा है।

    Aakash Waghmare
    By Aakash Waghmare

    आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...Read More

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