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सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार से पूछा सवाल-अफसरों के नाम भेजने में देरी क्यों? 

सुप्रीम कोर्ट पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के खिलाफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई की। ममता बनर्जी ने 1.36 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम गलत स्पेलिंग या पते बदलने के कारण हटाने की आशंका जताई है। कोर्ट ने बंगाल सरकार से अधिकारियों के नाम भेजने में देरी पर प्रश्न किया है।
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सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार से पूछा सवाल-अफसरों के नाम भेजने में देरी क्यों? 
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर दायर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई कर रहा है। इस मामले में अब चुनाव आयोग की ओर से जवाब रखा जा रहा है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल हैं, पूरे प्रकरण की संवैधानिक और प्रशासनिक वैधता की जांच कर रही है।

    1.36 करोड़ वोटरों की सूची पर ममता के गंभीर आरोप

    सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि राज्य में 1.36 करोड़ से अधिक मतदाताओं की सूची में ‘लॉजिकल गड़बड़ी’ है, जिसके आधार पर बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का खतरा पैदा हो गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरनेम की गलत स्पेलिंग, शादी के बाद महिलाओं के पते में बदलाव जैसी सामान्य और स्वाभाविक त्रुटियों को आधार बनाकर वोटरों को सूची से बाहर किया जा सकता है। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरनाक बताते हुए कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की।

    सीनियर एडवोकेट ने रखे आंकड़े

    मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दिवान ने अदालत के सामने ड्राफ्ट निर्वाचन सूची से जुड़े विस्तृत आंकड़े रखे, जिन्हें कोर्ट ने गंभीरता से सुना। यह सुनवाई मतदाता सूची की पारदर्शिता और प्रक्रिया की वैधता से जुड़ी मानी जा रही है। एडवोकेट दिवान ने बताया कि ड्राफ्ट इलेक्टोरल लिस्ट में कुल 7.08 करोड़ मतदाता दर्ज हैं। इनमें से लगभग 6.75 करोड़ मतदाता ‘मैप’ किए जा चुके हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मैपिंग का अर्थ यह है कि इन मतदाताओं के नाम या तो वर्ष 2002 की मतदाता सूची में मौजूद थे या फिर वे 2002 की सूची में दर्ज किसी रिश्तेदार के जरिए पहचान योग्य हैं। हालांकि, करीब 32 लाख मतदाता ऐसे हैं, जिनकी मैपिंग नहीं हो सकी है।

    कोर्ट की सख्त टिप्पणी, तथ्यात्मक विवाद नहीं चाहिए 

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि इस मामले में किसी भी तरह का तथ्यात्मक विवाद स्वीकार नहीं किया जाएगा। अदालत ने निर्देश दिया कि जिन अधिकारियों को डिपोर्टेशन के लिए भेजा जाना है, उनके नाम, पदनाम और अन्य विवरण पूरी तरह स्पष्ट होने चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बिना पूरी पहचान और पदनाम के किसी अधिकारी को तैनात या डिपोर्ट नहीं किया जा सकता।

    अधिकारियों की सूची को लेकर बहस 

    श्याम दिवान ने अदालत को बताया कि अधिकारियों की सूची पहले ही ईमेल के जरिए भेजी जा चुकी है और यह सूची जिला-वार व पदनाम-वार तैयार की गई है। हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि उन्हें ऐसी कोई सूची प्राप्त नहीं हुई है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ईमेल पहुंचने में तकनीकी देरी हो सकती है और संबंधित जूनियर अधिकारियों से इसकी जांच कराने को कहा।

     माइक्रो ऑब्जर्वर की नियुक्ति पर टकराव

    माइक्रो ऑब्जर्वर की नियुक्ति को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार और चुनाव आयोग के बीच तीखी बहस देखने को मिली। वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि विभिन्न राज्यों से पीएसयू और अन्य विभागों के अधिकारियों को माइक्रो ऑब्जर्वर बनाया जा रहा है। इस पर सीजेआई ने सवाल उठाया कि अगर उनकी भूमिका केवल माइक्रो ऑब्जर्वर की है, तो उनके पीएसयू अधिकारी होने से क्या फर्क पड़ता है। सिंघवी ने दलील दी कि चुनाव आयोग ने अतिरिक्त ग्रुप-बी अधिकारियों की मांग पहले नहीं की थी। श्याम दिवान ने अंत में बताया कि पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया 14 फरवरी को समाप्त होनी है और मांगी गई राहतों के लिए त्वरित निर्णय बेहद आवश्यक है।

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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