शाहिद खान, भोपाल
भोपाल में तेजी से गिरते भूजल स्तर ने चिंता बढ़ा दी है। राजधानी में जमीन का सीना चीरकर खोदे गए हजारों ट्यूबवेलों से हर दिन करोड़ों लीटर पानी निकाला जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार शहर में बढ़ते शहरीकरण, निजी बोरिंग और कंक्रीट निर्माण के कारण भूजल पर दबाव तेजी से बढ़ा है। यही वजह है कि भोपाल अब सेमी-क्रिटिकल जोन में पहुंच चुका है और अगर यही स्थिति जारी रही तो आने वाले वर्षों में यह क्रिटिकल जोन में भी पहुंच सकता है।
शहर और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में निजी बोरिंग के जरिए भूजल का उपयोग किया जा रहा है। अनुमान है कि राजधानी में 40 हजार से ज्यादा निजी ट्यूबवेल और बोरिंग मौजूद हैं, जिनसे रोजाना लगभग 8 करोड़ लीटर से अधिक पानी निकाला जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार जिले में करीब 13 हजार 080 खुले कुएं और लगभग 9 हजार 700 ट्यूबवेल और बोरवेल दर्ज हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे काफी अधिक हो सकती है, क्योंकि नई कॉलोनियों और बाहरी क्षेत्रों में निजी बोरिंग लगातार बढ़ रही हैं।

सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड और राज्य की डायनामिक ग्राउंड वॉटर रिसोर्सेस रिपोर्ट-2024 के अनुसार भोपाल में भूजल दोहन का स्तर करीब 79 प्रतिशत तक पहुंच गया है। जिले का कुल भौगोलिक क्षेत्र लगभग 2 लाख 77 हजार 237 हेक्टेयर है, जिसमें से लगभग 2 लाख 64 हजार 800 हेक्टेयर यानी करीब 96 प्रतिशत क्षेत्र में भूजल रिचार्ज की आवश्यकता बताई गई है। जिले में वार्षिक निकासी योग्य भूजल संसाधन 37 हजार 553 हेक्टेयर मीटर है, जबकि 29 हजार 776 हेक्टेयर मीटर भूजल पहले से ही उपयोग में लाया जा रहा है। इसका मतलब है कि जिले में भूजल दोहन की औसत दर 79.29 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, जो भविष्य के लिए खतरे का संकेत है।
भोपाल जिले के तीन प्रमुख ब्लॉक-फंदा, बैरसिया और शहरी क्षेत्र-सभी में भूजल दोहन का स्तर 70 से 80 प्रतिशत के बीच पहुंच चुका है। फंदा ब्लॉक में दोहन करीब 80.68 प्रतिशत, बैरसिया में 78.84 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र में लगभग 77 प्रतिशत दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति सेमी-क्रिटिकल श्रेणी को दर्शाती है, जिसका मतलब है कि अगर भूजल का उपयोग इसी गति से जारी रहा तो कुछ सालों में जल स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा सकता है।

शहर के आउटर एरिया और नई विकसित कॉलोनियों में स्थिति ज्यादा चिंताजनक हो गई है। कई क्षेत्रों में पानी पाने के लिए 200 से 300 फीट तक बोरिंग करनी पड़ रही है। विशेष रूप से कोलार रोड, बागसेवनिया, कटारा हिल्स, बावड़िया कलां, मिसरोद, अयोध्या बायपास और होशंगाबाद रोड के आसपास के इलाकों में जल स्तर तेजी से गिरने की शिकायत सामने आ रही है। कई पुराने ट्यूबवेल सूखने लगे हैं या उनका जल प्रवाह काफी कम हो गया है। बताया जा रहा है कि- भोपाल में भूजल स्तर हर साल औसतन 0.3 से 0.5 मीटर तक गिर रहा है, जबकि कुछ क्षेत्रों में यह गिरावट एक मीटर तक दर्ज की गई है।
भोपाल को झीलों का शहर कहा जाता है और यहां की जल आपूर्ति व्यवस्था का मुख्य आधार भी यही जल स्रोत हैं। शहर को मुख्य रूप से अपर लेक, (भोजताल) कोलार डैम, केरबा डैम और नर्मदा नदी से पानी की आपूर्ति की जाती है। हालांकि शहर के बाहरी इलाकों, नई कॉलोनियों और ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अभी भी बड़ी मात्रा में भूजल पर निर्भर हैं। यही कारण है कि इन क्षेत्रों में बोरिंग की संख्या तेजी से बढ़ी है और जल स्तर लगातार गिरता जा रहा है।