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NGT का अहम फैसला :मप्र में 'जहरीले पानी' की जांच IIT इंदौर और CPCB की टीम करेगी

NGT की सेंट्रल जोन बेंच ने मप्र के नगरीय निकायों के पानी की जांच IIT इंदौर और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB)  की टीम करेगी। इस संबंध में राज्य के सभी कलेक्टरों और निगमायुक्तों को सख्त निर्देश जारी किए गए हैं।
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मप्र में 'जहरीले पानी' की जांच IIT इंदौर और CPCB की टीम करेगी
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    भोपाल। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), सेंट्रल जोन बेंच, ने मध्य प्रदेश के शहरों में सीवेज मिश्रित और दूषित पेयजल की आपूर्ति को जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा मानते हुए गुरुवार को एक अहम फैसला सुनाया। जस्टिस शिव कुमार सिंह (न्यायिक सदस्य) और ईश्वर सिंह (विशेषज्ञ सदस्य) की बेंच ने कमल कुमार राठी बनाम मप्र शासन व अन्य के मामले की सुनवाई करते हुए राज्य शासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सभी स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय की है।

    छह सदस्यीय समिति गठित करने के निर्देश

    सुनवाई के दौरान कमल कुमार राठी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरप्रीत सिंह गुप्ता ने कहा कि भोपाल के तालाबों में फेकल कोलीफॉर्म (मल के जीवाणु) की मात्रा खतरनाक स्तर (1600 मिली) पर है और सीवेज लाइनें पेयजल लाइनों को दूषित कर रही हैं, जो सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन के अधिकार का हनन है। मामले की गंभीरता को देखते हुए, ट्रिब्यूनल ने जमीनी हकीकत की जांच के लिए एक 6-सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, जो 6 सप्ताह में अपनी रिपोर्ट देगी। समिति में आईआईटी (IIT), इंदौर के निदेशक द्वारा नामांकित विशेषज्ञ, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), भोपाल के प्रतिनिधि, प्रमुख सचिव, पर्यावरण विभाग, मप्र, प्रमुख सचिव, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग, जल संसाधन विभाग के प्रतिनिधि और मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) के प्रतिनिधि (नोडल एजेंसी) शामिल रहेंगे।

     सभी कलेक्टरों और निगमायुक्तों को आदेश

    NGT ने आदेश दिया है कि इस फैसले की प्रति मध्यप्रदेश के सभी जिलों के जिला कलेक्टर और सभी नगर निगम आयुक्तों को भेजी जाए, ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों में इन निर्देशों का तत्काल पालन सुनिश्चित कर सकें। मामले की अगली सुनवाई 30 मार्च 2026 को होगी।

    एनजीटी की गाइडलाइन

    MIS और 24x7 वाटर ऐप : एक मजबूत 'प्रबंधन सूचना प्रणाली' (MIS) और मोबाइल ऐप बनाया जाए, जिस पर पानी की गुणवत्ता रिपोर्ट, सप्लाई का समय और शिकायत निवारण की जानकारी हो।

    GIS मैपिंग : पूरे राज्य में पेयजल और सीवेज लाइनों की GIS-आधारित मैपिंग हो ताकि यह पता चले कि कहां सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल रहा है।

    एरेशन और क्लोरीनेशन : पानी की शुद्धता के लिए प्री-क्लोरीनेशन, पोस्ट-क्लोरीनेशन के साथ-साथ 'एरेशन प्रक्रिया' (Aeration process) अनिवार्य रूप से अपनाई जाए।

    टैंको की सफाई : सभी ओवरहेड टैंकों और सम्प-वेल (Sumps) को हमेशा चालू रखा जाए और उनकी नियमित सफाई व क्लोरीनेशन हो।

    पाइपलाइन मरम्मत : लीकेज और ट्रांसमिशन लॉस को रोकने के लिए युद्धस्तर पर पाइपलाइनों की मरम्मत हो।

    अतिक्रमण हटाना : जल स्रोतों (तालाब, कुएं, बावड़ी) के आसपास से सभी प्रकार के अतिक्रमण तुरंत हटाए जाएं।

    ग्रीष्मकालीन जल प्रबंधन : मार्च से जुलाई के बीच पानी की कमी को देखते हुए निर्माण कार्यों पर रोक लगे और वार्ड-वार राशनिंग की व्यवस्था हो।

    जल पुनर्चक्रण : सार्वजनिक कुओं और बावड़ियों को पुनर्जीवित (Regenerate) करने की योजना लागू की जाए।

    वाटर हार्वेस्टिंग : सरकारी और निजी भवनों (स्कूल/कॉलेज सहित) में रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य हो। पालन न करने पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

    क्या करें-क्या न करें : नागरिकों के लिए पानी के उपयोग के संबंध में 'Do's and Don'ts' जारी किए जाएं।

    डेयरियों का विस्थापन : शहर सीमा के भीतर 2 से अधिक पशुओं वाली सभी डेयरियों को 4 महीने के भीतर शहर से बाहर शिफ्ट किया जाए।

    मूर्ति विसर्जन पर पूर्ण रोक : किसी भी पेयजल स्रोत (डैम, तालाब) में मूर्तियों का विसर्जन पूरी तरह प्रतिबंधित रहे।

    मीटरिंग : सभी घरेलू और व्यावसायिक पानी के कनेक्शनों पर मीटर लगाए जाएं।

    टैंकर आपूर्ति : जल संकट के समय टैंकरों से आपूर्ति के लिए पूर्व निर्धारित शर्तों के साथ योजना तैयार रहे।

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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