सीहोर के पार्वती डैम में पानी रोका, तो डूब गया 100 साल पुराने मंदिर का रास्ता, थमी पूजा-अर्चना

सीहोर। नरसिंहगढ़ जल संसाधन विभाग द्वारा पार्वती (रेसई) परियोजना के डैम में पानी रोके जाने के बाद सीहोर जिले के सीमावर्ती गांवों में जलभराव की स्थिति गंभीर हो गई है। रविवार से बांध के सभी गेट बंद किए जाने के बाद पानी का स्तर बढ़ा तो इसका असर ग्रामीणों की आस्था के साथ किसानों की आवाजाही पर भी पड़ा। चांदबड़ जागीर ग्वालगढ़ स्थित करीब 100 साल पुराने हनुमान मंदिर का पहुंच मार्ग पानी में डूब गया। इसके चलते सोमवार और मंगलवार को मंदिर में नियमित पूजा-अर्चना और आरती नहीं हो सकी।
पानी में डूबा मंदिर का रास्ता, श्रद्धालु नहीं पहुंच सके
ग्रामीणों के अनुसार चांदबड़ जागीर ग्वालगढ़ का ऐतिहासिक हनुमान मंदिर करीब एक शताब्दी पुराना है। आसपास के कई गांवों के लोग यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। ग्रामीण हरिप्रसाद मैहर, प्रभूलाल अहिरवार, अर्जुन राजपूत और गोपाल सेन ने बताया कि रविवार को डैम के गेट बंद होने के बाद पानी तेजी से बढ़ा और मंदिर तक जाने वाला रास्ता पूरी तरह जलमग्न हो गया। पानी भरने के कारण सोमवार को मंदिर में नियमित आरती और पूजा नहीं हो सकी। मंगलवार को भी श्रद्धालु मंदिर तक नहीं पहुंच सके।
वैकल्पिक मंदिर और विस्थापन का इंतजार
ग्रामीणों का कहना है कि जब तक जलभराव की स्थिति बनी रहेगी, तब तक मंदिर तक पहुंचना मुश्किल रहेगा। उनका आरोप है कि परियोजना की डूब में आने वाले करीब 100 साल पुराने मंदिर के विस्थापन और नए मंदिर के निर्माण के लिए शासन की ओर से मिलने वाली मुआवजा राशि अब तक जारी नहीं हुई है। ग्रामीण नए स्थान पर मंदिर निर्माण के लिए तैयार हैं, लेकिन राशि नहीं मिलने से प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है।
ग्रामीण बोले- पहले व्यवस्था हो, फिर पानी रोका जाए
ग्रामीणों ने मांग की है कि जब तक मंदिर का वैकल्पिक पहुंच मार्ग और नए मंदिर की व्यवस्था नहीं होती, तब तक पानी की निकासी के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। उनका कहना है कि मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आसपास के गांवों की वर्षों पुरानी आस्था का केंद्र है। अचानक रास्ता डूब जाने से ग्रामीणों की धार्मिक गतिविधियां प्रभावित हुई हैं।
किसानों के खेतों तक भी पहुंचना हुआ मुश्किल
डैम में जलभराव का असर किसानों पर भी पड़ा है। ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग की ओर से पानी रोके जाने की समयसीमा और संभावित जलभराव को लेकर पर्याप्त पूर्व सूचना नहीं दी गई। इसी कारण कई किसानों ने अपने खेतों में रबी फसलों की बुवाई कर दी। अब पानी बढ़ने से खेतों तक जाने वाले रास्ते बंद हो गए हैं और किसानों को अपनी फसलों तक पहुंचने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
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50 से 60 किसानों का आवागमन प्रभावित
ग्रामीणों के मुताबिक चांदबड़ जागीर, महुआखेड़ा, मगरदीखुर्द, मानपुरा, रावतखेड़ा, आछारोही, मरेठी, भैरुपुरा और चरनाल सहित आसपास के गांवों में करीब 50 से 60 किसानों के खेतों तक पहुंच प्रभावित हुई है। किसानों का कहना है कि यदि जलस्तर बढ़ता रहा तो खेतों में खड़ी फसलों को भी नुकसान पहुंच सकता है। ऐसे में किसानों को समय रहते स्पष्ट सूचना और वैकल्पिक रास्ते की जरूरत है।
छह मीटर पानी भरने के दावे पर उठे सवाल
ग्रामीणों ने जल संसाधन विभाग के पूर्व दावों पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि अधिकारियों की ओर से पहले बताया गया था कि नदी के दायरे में करीब छह मीटर तक पानी भरेगा और इससे आवागमन के रास्ते प्रभावित नहीं होंगे। लेकिन पानी रोके जाने के बाद जमीनी स्थिति अलग दिखाई दे रही है। कई रास्ते जलमग्न होने से ग्रामीणों का आवागमन बाधित हो गया है।
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1815 करोड़ की परियोजना, फिर भी अधूरे इंतजाम
पार्वती रेसई परियोजना की लागत करीब 1815.54 करोड़ रुपये बताई गई है। परियोजना का निर्माण वर्ष 2022 में पूर्ण हुआ था। इसका उद्देश्य सीहोर, राजगढ़ और भोपाल जिले की करीब 48 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को पाइप सिंचाई प्रणाली के माध्यम से पानी उपलब्ध कराना है। परियोजना के जलग्रहण क्षेत्र का विस्तार करीब 3150 वर्ग किलोमीटर है।
3041 हेक्टेयर से अधिक भूमि डूब क्षेत्र में
परियोजना से जुड़े आंकड़ों के अनुसार सीहोर जिले में 901.53 हेक्टेयर निजी भूमि सहित कुल 3041.36 हेक्टेयर भूमि डूब क्षेत्र में आ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि इतनी बड़ी परियोजना में विस्थापन, वैकल्पिक रास्तों और धार्मिक स्थलों की पुनर्स्थापना जैसी व्यवस्थाएं पानी रोके जाने से पहले पूरी होनी चाहिए थीं। अब जलभराव के बाद ग्रामीण इन व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं।



















