बालाघाट में बच्चों की मौतों पर प्रशासन अलर्ट, 56 स्वास्थ्य टीमें गांवों में कर रहीं निगरानी

बालाघाट। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के बैगा आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चों की बीमारी और मौतों ने चिंता बढ़ा दी है। पिछले तीन महीनों में 32 बच्चों की मौत सामने आई है। प्रशासन के अनुसार, इन मौतों के पीछे कोई एक बीमारी जिम्मेदार नहीं है। मीजल्स, मलेरिया, उल्टी-दस्त, कुपोषण और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं को इसकी वजह बताया जा रहा है। हालांकि, स्थानीय लोगों का दावा है कि मृत बच्चों की संख्या सरकारी आंकड़ों से ज्यादा हो सकती है। प्रभावित गांवों में एक तरफ बीमारी को लेकर डर है, तो दूसरी ओर स्वास्थ्य सुविधाओं और साफ पानी की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
गांवों में बीमार बच्चों की बढ़ी संख्या
बीमारी से प्रभावित अड़ोरी गांव में महिलाओं ने बताया कि फिलहाल उनके बच्चे ठीक हैं, लेकिन आगे की स्थिति को लेकर चिंता बनी हुई है। वहीं कुंडेकसा के अस्थायी स्वास्थ्य केंद्र में बड़ी संख्या में बीमार बच्चे इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। कई बच्चों के शरीर पर दाने और फफोले दिखाई दे रहे हैं। स्वास्थ्य केंद्र में सीमित संसाधनों के बीच बच्चों का इलाज किया जा रहा है। यहां दो बेड और चार गद्दों पर मरीजों को रखा गया है। कुछ बच्चों को खिड़की के पास सलाइन चढ़ाते हुए भी देखा गया।
रोज करीब 60 बच्चे पहुंच रहे स्वास्थ्य केंद्र
कुंडेकसा, मच्छोरदा और सोनगुड्डा के स्वास्थ्य केंद्रों पर रोज करीब 20-20 बच्चे इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। बिरसा बीएमओ निमिष गौतम के मुताबिक, स्वास्थ्यकर्मी रोजाना 100 से 150 घरों में जाकर बच्चों की स्क्रीनिंग कर रहे हैं। प्रभावित क्षेत्र के 18 से 20 गांवों पर विशेष निगरानी रखी जा रही है। उसरी गांव में पन्ने मरकाम की तीन साल की बेटी तानिया इलाज के लिए भर्ती है। परिवार के मुताबिक, बच्चों को तेज बुखार, सर्दी-जुकाम और शरीर पर दाने की शिकायत हुई थी। परिवार का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान पोषण आहार नहीं मिला और बच्चों का टीकाकरण भी नहीं हो सका।
बच्चे की मौत के बाद परिवार ने उठाए सवाल
कोरका-बोंदारी इलाके में चैन सिंह मरकाम के पांच वर्षीय बेटे सचिन की भी मौत हो गई। परिवार के मुताबिक, बच्चे का जिला अस्पताल में दो दिन इलाज चला, लेकिन हालत में सुधार नहीं होने पर उसे गोंदिया ले जाया गया। वहां 31 जुलाई को उसकी मौत हो गई। परिवार का कहना है कि गांव में टीकाकरण और पोषण से जुड़ी सुविधाएं नियमित नहीं थीं। बोंदारी में साफ पेयजल की समस्या भी बनी हुई है। ग्रामीण आज भी नाले के पानी पर निर्भर हैं। करीब 60 वर्षीय दसरू धुर्वे रोज बीजाखोद नाले से पानी भरकर घर ले जाते हैं। उनका कहना है कि गांव तक पीने का पानी नहीं पहुंचता।
अस्पताल से लौटने के बाद फिर आया तेज बुखार
मरछुदा गांव के पांच वर्षीय अंकित मरावी को 10 सितंबर को जिला अस्पताल से स्वस्थ बताकर घर भेजा गया था। परिवार के मुताबिक, घर लौटने के बाद उसे दोबारा तेज बुखार हो गया। अब परिजन उसका फिर से इलाज कराने की तैयारी में हैं।
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मीजल्स और मलेरिया के भी मिले मामले
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, अब तक 37 हजार लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है और करीब 4,500 लोगों का इलाज किया गया है। 130 बिस्तरों की व्यवस्था वाले केंद्रों में फिलहाल 57 बच्चे भर्ती हैं, जबकि 490 बच्चों को स्वस्थ होने के बाद घर भेजा जा चुका है। जांच के दौरान 101 मीजल्स सैंपल में 32 पॉजिटिव मिले हैं। मलेरिया के 64 सैंपल में 50 पॉजिटिव पाए गए। डेंगू के 28 सैंपल में दो पॉजिटिव मिले हैं, जबकि चिकनगुनिया का एक सैंपल भी पॉजिटिव आया है। पानी के 14 सैंपल में पांच में संक्रमण के संकेत मिले हैं।
56 स्वास्थ्य टीमें कर रहीं निगरानी
सीएमएचओ डॉ. शत्रुघ्न सिंह दाहिया के अनुसार, बच्चों की मौत को केवल मीजल्स से जोड़ना सही नहीं होगा। प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य विभाग की 56 टीमें करीब 200 कर्मचारियों और 40 डॉक्टरों के साथ काम कर रही हैं। कलेक्टर कुमार सत्यम के मुताबिक, स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। प्रभावित क्षेत्रों में आने-जाने की परेशानी को देखते हुए एंबुलेंस और स्थानीय वाहनों की व्यवस्था भी की जा रही है, ताकि जरूरत पड़ने पर मरीजों को जल्द अस्पताल पहुंचाया जा सके। फिलहाल स्वास्थ्य विभाग की टीमें गांवों में स्क्रीनिंग, इलाज और निगरानी का काम कर रही हैं। बच्चों की बीमारी के कारणों को लेकर जांच और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की कोशिश जारी है।



















