Naresh Bhagoria
2 Jan 2026
इंदौर। देशभर में प्रसिद्ध इंदौर का हिंगोट युद्ध गौतमपुरा में धोक पड़वा पर इस बार करीब डेढ़ घंटे तक चला। दीपावली के दूसरे दिन सालों से चल रही इस परंपरा के तहत मैदान में गौतमपुरा और रूणजी के वीर योद्धा तुर्रा और कलंगी ने अलग-अलग समूहों में बंटकर करीब डेढ़ घंटे तक एक-दूसरे पर अग्नि बाणों की वर्षा की। हालांकि इस बार आधे घंटे पहले ही हिंगोट युद्ध खत्म हो गया। इसमें 5 योद्धा घायए हुए हैं।
यह एक ऐसा युद्ध है जो जानलेवा नहीं है, बल्कि साहस, परंपरा और लोक आस्था का प्रतीक है। इसमें हार-जीत नहीं, बल्कि शौर्य और परंपरा का प्रदर्शन मायने रखता है। यह युद्ध जितना खतरनाक होता है, उतना ही रोमांचक भी होता है।
साल 1984 में दिल्ली में हुए मालवा कला उत्सव में विशेष आमंत्रण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सामने तुर्रा व कलंगी दल के योद्धाओं ने इसका प्रदर्शन किया था। उस समय करीब 16 योद्धाओं को नगर के प्रकाश जैन दिल्ली ले गए थे। दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में करीब एक घंटे इसका प्रदर्शन किया गया था।
अक्टूबर 2017 में गौतमपुरा में बड़नगर तहसील के दातरवां गांव का 22 साल का किशोर मालवीय दोस्तों के साथ हिंगोट युद्ध देखने पहुंचा था। वह दर्शक दीर्घा में बैठा था, तभी एक हिंगोट उसके सिर पर लग गया था। उसे गंभीर हालत में एमवाय अस्पताल लाया गया, जहां उसकी इलाज के दौरान मौत हो गई थी। करीब सवा घंटे चले इस हिंगोट युद्ध में 38 लोग घायल हुए थे।
वहीं इस मौत के बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। याचिका में कहा गया कि यह परंपरा अमानवीय है। इसमें बारूद भरी हिंगोट एक-दूसरे पर फेंकी जाती हैं, जिससे जान का खतरा रहता है। जल्लीकट्टू की तरह इस पर भी रोक लगाई जाए।
कोर्ट ने तब राज्य सरकार और जिला प्रशासन से जवाब मांगा था। मामला अभी भी रिकॉर्ड पर है, लेकिन परंपरा हर साल निभाई जा रही है। वहीं कोर्ट में इस मामले की पैरवी करने वाले एडवोकेट प्रतीक माहेश्वरी बताते हैं..कोर्ट से दोनों दलों को करीब दो साल पहले नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया था। अभी तक जवाब पेश नहीं किया गया है। मामले में अगली सुनवाई की तारीख फिलहाल तय नहीं है।