गरुड़ पुराण के अनुसार, इस संसार में जो भी जन्म लेता है, उसकी मृत्यु निश्चित है। मनुष्य, देवता, पशु या पक्षी- कोई भी इस नियम से नहीं बच सकता। यहां तक कि सूर्य, ग्रह और नक्षत्रों की भी एक तय आयु होती है।
इसे जन्म और मृत्यु का चक्र कहा गया है। आत्मा अपने कर्मों और मानसिक अवस्था के अनुसार अलग-अलग योनियों में जन्म लेती है। यह चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक आत्मा को मोक्ष नहीं मिल जाता।
गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद होने वाली प्रक्रियाओं को लेकर कई नियम बताए गए हैं। इन्हीं में यह भी बताया गया है कि शव को अकेला क्यों नहीं छोड़ा जाता और कब अंतिम संस्कार तुरंत नहीं किया जाता।
मान्यता है कि अगर शव को अकेला छोड़ दिया जाए, तो कीड़े-मकोड़े, चींटियां या अन्य जीव उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए कोई न कोई व्यक्ति पास में रहता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रात में शव को अकेला छोड़ना नकारात्मक शक्तियों को आकर्षित कर सकता है, जिससे परिवार पर मानसिक प्रभाव पड़ सकता है।
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि जब तक अंतिम संस्कार नहीं होता, तब तक आत्मा शरीर और अपने परिजनों से जुड़ी रहती है। ऐसे में शव को अकेला छोड़ना आत्मा को कष्ट दे सकता है।
अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु सूर्यास्त के बाद होती है, तो उसी समय दाह संस्कार नहीं किया जाता। शव को रात भर घर में रखकर अगली सुबह अंतिम संस्कार किया जाता है। मान्यता है कि रात में दाह संस्कार करने से आत्मा को शांति नहीं मिलती।
यदि मृत्यु पंचक काल में होती है, तो पंचक समाप्त होने तक दाह संस्कार टाल दिया जाता है। इस दौरान शव की देखरेख की जाती है और विशेष धार्मिक उपाय किए जाते हैं, ताकि दोष का प्रभाव खत्म हो सके।
अगर मृतक का पुत्र या पुत्री मौके पर मौजूद न हो, तो उनके आने तक अंतिम संस्कार रोका जाता है। मान्यता है कि संतान द्वारा किया गया दाह संस्कार आत्मा को शांति देता है।