'तीन कौवे' एक पूरी तरह फिक्शनल स्पाई थ्रिलर सीरीज है, जिसका आइडिया अब्बास टायरवाला ने विकसित किया और इसे प्रियंका घोष डायरेक्ट कर रही हैं। सीरीज में दमदार कास्ट, रियलिस्टिक एक्शन, म्यूजिक और एडिटिंग के जरिए सस्पेंस को ‘एज ऑफ द सीट’ बनाए रखने पर खास फोकस किया गया है।
ये किसी रियल कहानी से इंस्पायर्ड नहीं है। ये पूरी तरह फिक्शनल स्टोरी है। इसका आइडिया हमारे राइटर और क्रिएटर अब्बास टायरवाला से आया था। उन्होंने करीब 7–8 साल पहले इस पर काम शुरू किया था। उन्होंने इस आइडिया को काफी लंबे समय तक डेवलप किया। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ी, इसके कैरेक्टर्स भी बढ़ते गए, दुनिया बड़ी होती गई। तब उन्हें लगा कि ये फिल्म से ज्यादा एक सीरीज के लिए बेहतर रहेगा। अब्बास ने इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाते हुए सिद्धार्थ रॉय कपूर को अप्रोच किया। फिर मुझे डायरेक्टर और को-क्रिएटर के तौर पर जोड़ा गया।
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प्रेशर से ज्यादा मुझे एन्करेजमेंट महसूस होता है। मैंने पहले भी इस जॉनर में काम किया है, जैसे ‘द नाइट मैनजर’। जब हम ‘तीन कौवे’ बना रहे थे, तब हमें ‘धुरंधर’ के बारे में पता था, लेकिन जब कोई फिल्म या शो इस जॉनर में इतना अच्छा करता है और लोगों को पसंद आता है, तो वो आपको री-अश्योरेंस करता है कि इस तरह की कहानियों के लिए ऑडियंस मौजूद है। हर जॉनर में अलग-अलग टोन और अलग-अलग कहानियां हो सकती हैं। एक ही जॉनर का मतलब ये नहीं कि कहानी भी एक जैसी होगी। ‘तीन कौवे’ की दुनिया, उसके किरदार, उसका टोन सब अलग है। इसलिए ये प्रेशर नहीं, बल्कि एक पॉजिटिव फीलिंग है कि लोग इस तरह की कहानियों को पसंद कर रहे हैं। अभी हम एडिट के स्टेज में हैं और शो को फिनिश कर रहे हैं, तो ये एक अच्छा अनुभव है।
हर किरदार के लिए सही एक्टर ढूंढना डायरेक्टर की लाइफ का एक बहुत बड़ा हिस्सा होता है। हमने कास्टिंग डायरेक्टर के साथ बैठकर कई ऑप्शन्स देखे, फिर प्रोड्यूसर सिद्धार्थ राय कपूर, क्रिएट-राइटर अब्बास और अमेज़न प्राइम के साथ डिस्कशन किया कि किसे लेना चाहिए। उसके बाद एक्टर्स को नैरेशन दिया और देखा कि उनका रिएक्शन क्या है। इस प्रोजेक्ट में मैं खुद को बहुत लकी मानती हूं, क्योंकि जिन एक्टर्स को हम चाहते थे, वो सभी मिले और सभी उतने ही एक्साइटेड थे। सबने तुरंत हां कहा और तब से ये एक बहुत अच्छा कोलैबोरेशन रहा है। बाकी जब हम स्क्रीनप्ले और डायलॉग पर काम कर रहे थे, तभी हमारे दिमाग में कुछ चेहरे बनने लगे थे। जैसे बॉबी (देओल) सर, कबीर (बेदी( सर, रोनित (रॉय) सर, सिद्धांत गुप्ता, फातिमा सना शेख, पावेल गुलाटी, फैसल मलिक। इन सबके लिए हमारे पास एक क्लियर आइडिया था कि ये किरदार कौन निभा सकता है। और जैसा मैंने कहा, मैं लकी रही कि जिनको हमने अप्रोच किया, उन्होंने उसी एक्साइटमेंट के साथ प्रोजेक्ट जॉइन किया।
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अभी मैं इसे डिस्क्लोज नहीं कर पाऊंगी। ट्रेलर आने पर थोड़ा आइडिया मिलेगा। हम जानबूझकर टीज़र में ज्यादा कुछ नहीं बताना चाहते थे। ‘तीन कौवे’ कौन हैं, ये धीरे-धीरे पता चलेगा। जो चेहरे दर्शक पोस्टर या टीज़र में देख रहे हैं, ज़रूरी नहीं कि वही ‘तीन कौवे’ हों।
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हमने लगभग पूरा साल इस शो को शूट किया और कई मुश्किलें झेलीं। बहुत सारे चैलेंजेस आए। कुछ एक्टर्स को हेल्थ प्रॉब्लम्स भी आईं, जिससे शूट रोकना पड़ा। फिर पिछले साल मार्च में अचानक बारिश शुरू हो गई, जबकि हम आउटडोर शूट कर रहे थे। हमें पूरा प्लान बदलकर इंडोर शूट करना पड़ा। सबसे मुश्किल शेड्यूल लद्दाख का था। वहां हम शूट कर रहे थे और उसी समय ‘धुरंधर’ की टीम भी वहीं थी। अचानक 3-4 दिन तक तूफान आया, नेटवर्क पूरी तरह बंद हो गया। हमारे परिवार हमसे संपर्क नहीं कर पा रहे थे। हालांकि उस दौरान हमने होटल में बैठकर रिहर्सल्स की और काफी काम निपटाया। फ्लाइट्स कैंसिल हो रही थीं, टीम के लोग समय पर नहीं पहुंच पा रहे थे। करीब 8 दिन बाद हम शूट शुरू कर पाए। इंडियन आर्मी की हेल्प से ही हमें कॉल्स करने में मदद मिली। फिर शूट शुरू होते ही फिर से बारिश और तूफान आ गया। ये सब बहुत टफ था, लेकिन हमारी पूरी प्रोडक्शन टीम, एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर राहुल गांधी, जो ‘धुरंधर’ से भी जुड़े थे। उन्होंने सब मैनेज किया। प्रोड्यूसर सिद्धार्थ रॉय कपूर उन्होंने भी मुंबई से ही सब मैनेज किया। सबसे अच्छी बात ये रही कि पूरी टीम एकजुट थी और सबने 100-200% दिया। अब जब मैं एडिट टेबल पर फुटेज देखती हूं, तो याद आता है कि हमने कितनी मुश्किलें झेली थीं लेकिन अब उसका रिजल्ट देखना बहुत सैटिसफाइंग है।
मेरी कोशिश हमेशा से यही रहती है। चाहे मैंने ‘द नाइट मैनेजर' की, ‘द रॉयल्स' की या फिर ये ‘तीन कौवे’ जब भी मैं कोई नया प्रोजेक्ट शुरू करती हूं तो मेरा सबसे पहला लक्ष्य उस दुनिया को रचना और किरदारों को उस माहौल में पूरी तरह से ढालना होता है। कहानी को सही ढंग से कहना ही असली चुनौती है। अंततः आप किस तरह से कहानी कह रहे हैं, उसी में मज़ा है और दर्शकों की दिलचस्पी भी उसी में होती है। किसी भी कहानी को दर्शक किस तरह से ग्रहण करेंगे, इसमें विजुअल ट्रीटमेंट, साउंड डिज़ाइन और म्यूजिक बहुत बड़े कारक होते हैं। इसलिए मैं इन चीजों पर बहुत ज्यादा ध्यान देती हूं। प्री-प्रोडक्शन के दौरान मैं इन पर काफी समय बिताती हूं और अपने सभी डिपार्टमेंट हेड्स के साथ मिलकर काम करती हूं ताकि अपने विज़न को सही तरीके से एग्जीक्यूट कर सकूं।
विजुअली मैं एक बहुत ही स्पेसिफिक लैंग्वेज पर काम कर रही थी, जिसकी एक झलक टीजर में दिखी। विशेष रूप से एक्शन सीक्वेंस को प्लान करने में मुझे काफी वक्त लगा। हमारे एक्शन डायरेक्टर एजाज गुलाब रहे, जिन्होंने फ्रांस के मार्शल आर्ट एक्सपर्ट यानिक बेन को लाकर एक्टर्स को ट्रेन करवाया। एजाज पूरे प्रोजेक्ट में एक मजबूत क्रिएटिव सपोर्ट रहे और एक्शन सीक्वेंस को रियल और इम्पैक्टफुल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। इस बार मेरा फोकस ‘हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट' पर ज़्यादा था। इसे परफेक्ट बनाने के लिए हमारे एक्टर्स ने दो-तीन महीने तक मार्शल आर्ट्स की कड़ी ट्रेनिंग ली। जब तक यानिक भारत नहीं पहुंचे थे, मैं ज़ूम कॉल के ज़रिए उनके साथ जुड़कर एक-एक सीक्वेंस की प्लानिंग करती थी।
म्यूजिक के मोर्चे पर मैं अचिंत ठक्कर और पार्थ पारेख के साथ काम कर रही हूं और साउंड डिज़ाइनर यात्रिक दवे हैं। हमने म्यूजिक पर बहुत पहले से काम शुरू कर दिया था क्योंकि मुझे एक्शन सीक्वेंसेज के लिए एक खास ‘पेस' और ‘सुर' चाहिए था। मुझे यह पहले से तय करना था कि हम किस ‘बीपीएम' (बीट्स पर मिनट) और मूड पर काम करेंगे। सौभाग्य से, अचिंत और पार्थ ने उन बारीकियों को बहुत अच्छे से पकड़ा है। अभी भी इस पर काम चल रहा है। दरअसल, अभी हमारा सबसे ज़्यादा समय म्यूजिक और साउंड पर ही लग रहा है, क्योंकि यह काम एडिटिंग के साथ-साथ चलता है। मेरे एडिटर परीक्षित झा और मैं मिलकर एडिटिंग टेबल पर अचिंत और पार्थ के म्यूजिक का बेहतरीन इस्तेमाल कर रहे हैं। इस प्रक्रिया को पूरी तरह खत्म होने में अभी कुछ महीने और लगेंगे, लेकिन यह सब कुछ बहुत ही बारीकी से प्लान किया गया है।
मैं चाहूंगी कि लोग शो देखकर इसे एक्सपीरियंस करें। मेरा मानना है कि हर कहानी असल में तीन बार लिखी जाती है। पहली बार जब आप उसे कागज पर उतारते हैं (राइटिंग स्टेज), दूसरी बार जब आप उसे कैमरे पर उतारते हैं (शूटिंग स्टेज) और तीसरी व अंतिम बार जब आप उसे मेज पर सजाते हैं (एडिटिंग स्टेज)। फिलहाल हम तीसरी स्टेज यानी ‘एडिट' पर हैं और इसकी काफी बारीकी से फाइन ट्यून कर रहे हैं। हमने जहां से शुरुआत की थी, एडिटिंग के दौरान उसमें कई बदलाव किए जा रहे हैं ताकि कहानी को एक बेहतर शेप और स्ट्रक्चर दिया जा सके। चूंकि यह 8 एपिसोड की एक लंबी कहानी है, इसलिए हमारी जिम्मेदारी दर्शकों को न केवल मनोरंजन देना है, बल्कि उन्हें लगातार ‘एज ऑफ द सीट' रखना भी है। इसके लिए हम प्लॉट और मिस्ट्री को इस तरह बुन रहे हैं कि दर्शक अंत तक एक्साइटेड रहें। सस्पेंस सिर्फ लिखने से नहीं आता, यह पूरी प्रक्रिया के दौरान विकसित होता है। एडिट के दौरान हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि कहानी का टेंशन कहीं कम न हो और हर मोड़ पर ट्विस्ट दर्शकों को चौंकाते रहें। जहां तक स्पेशल टेक्निक की बात है, तो यह सब इन्स्टिंक्ट यानी सहज बोध से आता है। एडिटिंग टेबल पर बैठकर हम यह तय करते हैं कि कहां पर टेंशन को रोक कर रखना जरूरी है? कहानी का कौन सा हिस्सा किस मोड़ पर रिवील करना है? अभी भी इस पर काम चल रहा है, ताकि जब दर्शक इसे देखें, तो उन्हें वह थ्रिल महसूस हो जिसकी हम उम्मीद कर रहे हैं।
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मेरे हिसाब से जब हम हॉलीवुड की बड़ी जासूसी फ्रेंचाइज जैसे ‘जेम्स बॉन्ड' या ‘जेसन बोर्न' की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि वे फिल्में पूरी दुनिया के दर्शकों के लिए बनाई जाती हैं। अंग्रेजी भाषा की वैश्विक पहुंच के कारण उनके पास जो बजट होता है, वह हमारे देश की किसी भी बड़ी फिल्म या फ्रेंचाइज चाहे वह ‘धुरंधर' हो, ‘पठान' हो या ‘वॉर' उनके बजट से कई गुना ज्यादा होता है। हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती तब थी जब हम ‘द नाइट मैनेजर' बना रहे थे। हमें पता था कि मूल इंग्लिश सीरीज का बजट हमारे बजट से पांच गुना ज्यादा था लेकिन बजट की यह पाबंदी आपको बहुत स्मार्टली और इंटेलिजेंटली कहानी कहने का मौका देती है। आपको यह तय करना पड़ता है कि आप अपने सीमित संसाधनों का इस्तेमाल कहां और कैसे सबसे बेहतर तरीके से कर सकते हैं। बजट के मामले में हम उनकी बराबरी नहीं कर सकते, लेकिन अगर आप काम की गुणवत्ता देखें, तो हम कहीं पीछे नहीं हैं। आज का समय हमारे लिए बहुत उत्साहजनक है। ‘द नाइट मैनेजर' को इंटरनेशनल एमी अवॉर्ड्स में न्यूयॉर्क में नॉमिनेशन मिला। ‘वॉर' और ‘पठान'जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर मैसिव हिट देकर साबित किया कि हमारे दर्शक इस स्केल को पसंद कर रहे हैं। ओटीटी पर ‘द फैमिली मैन' और ‘स्पेशल ऑप्स' जैसी सीरीज ने जासूसी कहानियों के स्तर को बहुत ऊंचा उठाया है। अभी हमारे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा ‘धुरंधर' जैसी फिल्में हैं। हमारे यहां बेहतरीन टेक्नीशियंस और कलाकारों की कोई कमी नहीं है जो इस तरह के प्रोजेक्ट्स के साथ पूरा न्याय कर सकें। हमें जितना भी बजट और स्केल दिया जाता है, हम उसे पूरी तरह निभाने की कोशिश करते हैं। हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि हम अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स की तुलना में इतने कम बजट के बावजूद उनके टक्कर का काम कर पा रहे हैं और वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं।
हमारी यह कहानी पूरी तरह से भारत आधारित है। जैसा कि टीजर में एक डायलॉग भी है कि ‘1993 के बाद बॉम्बे (मुंबई) की हिफाजत के लिए एक सीक्रेट एजेंसी बनाई गई' तो हमारी कहानी का मुख्य केंद्र बॉम्बे ही है। चूंकि कहानी की जड़ें यहीं की हैं, इसलिए हमने देश के भीतर ही अलग-अलग लोकेशन्स पर शूट किया है। बॉम्बे (मुंबई) में फिल्म का एक बड़ा हिस्सा शूट किया गया है। हमारा एक पूरा शेड्यूल लद्दाख की खूबसूरत और चुनौतीपूर्ण वादियों में हुआ है। कहानी के कुछ हिस्सों को हमने गोवा में भी फिल्माया है। इसके अलावा हमने पुणे, वाई और महाबलेश्वर जैसी जगहों पर भी कुछ महत्वपूर्ण पोर्शन्स शूट किए हैं। भले ही हम इंडिया के बाहर नहीं गए, लेकिन हमारे कई आउटडोर शेड्यूल्स रहे हैं। हमारी कहानी की मिट्टी यहीं की है, इसलिए हमने इसे भारत के ही विभिन्न हिस्सों में शूट करना सही समझा।