‘खुद कहा था खरीदो, अब सवाल क्यों?’रूसी तेल पर जयशंकर का अमेरिका को करारा जवाब

भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने रूस से तेल खरीदने को लेकर पश्चिमी देशों की आलोचना का जवाब देते हुए कहा कि, भारत ने हमेशा अपने राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक जरूरतों को प्राथमिकता दी है। फिनलैंड में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के दौरान उन्होंने खुलासा किया कि रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका ने खुद भारत से रूसी तेल खरीदने का आग्रह किया था, ताकि वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता बनी रहे और कीमतों में बेतहाशा उछाल न आए।
जयशंकर के इस बयान ने रूस से तेल खरीदने को लेकर सालों से चल रही बहस को नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने कहा कि, जो देश आज भारत के फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं, उन्होंने ही संकट के समय अलग रुख अपनाया था।
फिनलैंड में उठे सवाल, भारत ने दिया जवाब
फिनलैंड के कुल्टारांता में आयोजित कार्यक्रम के दौरान एक पत्रकार ने भारत पर रूस के प्रति अधिक सहानुभूति रखने और रूसी तेल खरीदने के लिए उत्सुक होने का आरोप लगाया। इसके जवाब में विदेश मंत्री ने कहा कि भारत तेल की खरीद किसी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नहीं, बल्कि कीमत और उपलब्धता के आधार पर करता है।
उन्होंने कहा कि, जब यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, तब वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल थी। उस समय बाजार में उपलब्ध अधिकांश अतिरिक्त तेल रूस से आ रहा था और भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए व्यावहारिक निर्णय लेना पड़ा।
अमेरिका ने खुद कहा था रूस से तेल खरीदो
जयशंकर ने कहा कि, 2022 में जब रूस पर पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाए, तब वैश्विक तेल आपूर्ति पर दबाव बढ़ गया था। उस दौर में अमेरिका ने भारत से विशेष रूप से रूस से तेल खरीदने का आग्रह किया था, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति बनी रहे और कीमतें नियंत्रण से बाहर न जाएं। उन्होंने कहा कि, उस समय वैश्विक बाजार को स्थिर रखना सभी देशों की प्राथमिकता थी और भारत ने उसी जिम्मेदारी के साथ कदम उठाया।
विदेश मंत्री बोले- यूरोप ले गया मिडिल ईस्ट का तेल
विदेश मंत्री ने बताया कि भारत परंपरागत रूप से मध्य-पूर्वी देशों से तेल खरीदता रहा है, लेकिन युद्ध के बाद यूरोपीय देशों ने बड़ी मात्रा में मिडिल ईस्ट से तेल खरीदना शुरू कर दिया। इस वजह से भारत के लिए वैकल्पिक स्रोत तलाशना जरूरी हो गया। ऐसे में रूस एक व्यवहारिक और उपलब्ध विकल्प बनकर सामने आया।
जयशंकर ने कहा कि परिस्थितियों ने भारत को उस दिशा में आगे बढ़ने के लिए मजबूर किया और यह फैसला पूरी तरह आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा था।
रूस को बताया भरोसेमंद ऊर्जा साझेदार
विदेश मंत्री ने रूस को एक स्थिर और भरोसेमंद सप्लायर बताया। उन्होंने कहा कि कठिन वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद रूस ने लगातार आपूर्ति बनाए रखी और भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए खरीद जारी रखी। उन्होंने कहा कि, भारत का लक्ष्य हमेशा ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना रहा है, न कि किसी राजनीतिक गुट का समर्थन करना।
अमेरिका की बदलती नीति पर उठाए सवाल
जयशंकर ने रूसी तेल को लेकर अमेरिका की नीतियों में आए बदलावों की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि, एक समय भारत पर रूसी तेल खरीदने को लेकर अतिरिक्त टैरिफ लगाए गए। बाद में अमेरिका ने स्वयं कई प्रतिबंधों में ढील दे दी। ऐसे में इस पूरे मुद्दे को नैतिकता या सिद्धांतों की लड़ाई बताना उचित नहीं है। उनका कहना था कि, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर परिस्थितियों के अनुसार नीतियां बदलती हैं, इसलिए भारत के फैसलों को भी उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
भारत पर लगे थे अतिरिक्त टैरिफ
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में उस समय तनाव बढ़ गया था जब तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन ने भारतीय उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने को लेकर अतिरिक्त शुल्क भी लगाया गया था। हालांकि, बाद में दोनों देशों के बीच बातचीत और अंतरिम व्यापार समझौतों के बाद इन शुल्कों में कमी की गई।
ईरान संकट के बाद अमेरिका ने दी थी छूट
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े संघर्ष के बाद अमेरिका ने रूसी समुद्री तेल से जुड़े कुछ प्रतिबंधों में ढील दी थी। इसका उद्देश्य ऊर्जा संकट झेल रहे देशों को राहत देना और वैश्विक तेल कीमतों को नियंत्रण में रखना था। इससे यह संकेत मिला कि ऊर्जा बाजार की वास्तविकताओं के सामने कई बार राजनीतिक रुख भी बदलने पड़ते हैं।
भारत का रुख पहले जैसा ही रहा
भारत सरकार लगातार यह कहती रही है कि रूस से तेल खरीदने का फैसला किसी अमेरिकी छूट या प्रतिबंध से प्रभावित नहीं है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकारियों ने भी हाल के महीनों में कहा था कि, भारत पहले भी रूस से तेल खरीद रहा था, छूट के दौरान भी खरीदता रहा और आगे भी अपनी जरूरतों तथा व्यावसायिक व्यवहार्यता के आधार पर खरीद जारी रखेगा।
यूरोप की ‘नैतिक अस्पष्टता’ पर भी बोले जयशंकर
कार्यक्रम के दौरान विदेश मंत्री ने यूरोपीय देशों की नीतियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि, किसी भी यूरोपीय देश पर भारतीय हथियारों से हमला नहीं हुआ है, लेकिन भारत के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले कई हथियार यूरोपीय देशों से आते हैं। जयशंकर ने कहा कि, भारत ने कभी भी यूरोप की सुरक्षा को खतरे में डालने वाला कोई कदम नहीं उठाया, इसलिए इस विषय पर भारत की चिंताओं को भी समझा जाना चाहिए।
फिनलैंड की विदेश मंत्री ने किया भारत का समर्थन
कार्यक्रम के दौरान फिनलैंड की विदेश मंत्री एलीना वाल्टोनेन ने भी भारत के पक्ष का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि जब रूसी तेल पर प्राइस कैप लागू किया गया था, तब दुनिया को रूसी तेल खरीदने से नहीं रोका गया था। उनका कहना था कि, भारत ने निर्धारित सीमा के भीतर तेल खरीदा और यही उस व्यवस्था का उद्देश्य भी था। इस बयान को भारत के पक्ष में एक महत्वपूर्ण समर्थन माना जा रहा है।
भारत की प्राथमिकता- ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित
जयशंकर ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि भारत की विदेश नीति और ऊर्जा नीति का आधार राष्ट्रीय हित है। उन्होंने कहा कि भारत किसी दबाव, राजनीतिक नैरेटिव या बाहरी अपेक्षाओं के आधार पर नहीं, बल्कि अपने नागरिकों और अर्थव्यवस्था की जरूरतों को ध्यान में रखकर फैसले लेता है। उनका कहना था कि ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और व्यावहारिक कूटनीति भारत की प्राथमिकता रहेगी, चाहे वैश्विक राजनीति में कितना भी दबाव क्यों न हो।











