भोपाल। राजधानी के छोटा तालाब (लोअर लेक) को और छोटा किया जा रहा है। पिछले कई दिनों से तालाब किनारे पाथ-वे से करीब 4-5 फीट आगे तक पत्थर डंप कर तालाब को पूरा जा रहा है। इधर, ये काम करा रहे नगर निगम अफसरों की दलील है कि तालाब संरक्षण और सौंदर्यीकरण के तहत पिचिंग का काम किया जा रहा है, ताकि किनारों पर सिल्ट न जमे। इधर, निगम की दलील को एनवायरनमेंट एक्टीविस्टों ने नकार दिया है। उनका आरोप है कि तालाब किनारे कमर्शियल जमीन तैयार करने की कोशिश की जा रही है। इससे तालाब का जल क्षेत्र प्रभावित होगा और बायोडायवर्सिटी पर नकारात्मक असर पड़ेगा। यह काम एक महीने से चल रहा है।
बता दे कि झील संरक्षण के तहत नगर निगम छोटे तालाब की टूटी बाउंड्रीवॉल मेंटेनेंस के साथ ही पाथ-वे रिपेयरिंग का काम करा रहा है। लाइटें ठीक कराने के साथ ही रंग-रोगन भी कराया जाएगा। यही नहीं, तालाब में बाणगंगा नाले सहित अन्य नालों से पानी के साथ आने वाली गंदगी और कचरे को तालाब में मिलने से रोकने के लिए किनारों पर स्लोप बनाने और जाली लगाने का काम होगा। यहां तक सब कुछ ठीक था, लेकिन पिछले कुछ दिनों से निगम ने तालाब के किनारों पर पाथ-वे से सटाकर पत्थरों की डंपिंग शुरू कराई है। पाथ-वे से 4 से 5 फीट आगे तक लगातार पत्थर डंप किए जा रहे हैं। इसका एनवायरनमेंट एक्टीविस्टों ने न सिर्फ विरोध किया है, बल्कि मामले को एनजीटी तक पहुंचा दिया। एनजीटी ने भी मामले में सुनवाई करते हुए संबंधित एजेंसियों को नोटिस जारी करने के आदेश दिए हैं।
मौके पर चल रहे काम में तालाब के किनारों को मजबूत करने के लिए पिचिंग की जा रही है। इसके तहत पानी वाले हिस्से में पत्थर डाले जा रहे हैं। साथ ही झील में आने वाले नालों से सिल्ट को रोकने के लिए प्लेटफॉर्म और रैंप बनाए जा रहे हैं, ताकि मशीनों की मदद से गाद निकाली जा सके और गंदगी सीधे तालाब में न पहुंचे। इसके अलावा नालों से आने वाली गंदगी रोकने के लिए जालियां भी लगाई जाएंगी।
[featured type="Featured"]
नगर निगम अधिकारियों के अनुसार, तालाब में जमा सिल्ट को निकालने की भी योजना है। डी-सिल्टिंग से तालाब की गहराई बढ़ेगी और जल संग्रहण क्षमता में सुधार होगा। हालांकि, पर्यावरणविद इस दावे से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि पाथ-वे से आगे पत्थर डालना और किनारों के साथ छेड़छाड़ करना तालाब के प्राकृतिक स्वरूप को बदल देगा। यह संरक्षण के बजाय धीरे-धीरे जल क्षेत्र कम करने जैसा है। इससे जलीय जीवों और पौधों का प्राकृतिक आवास खत्म होगा।

गौरतलब है कि छोटे तालाब के किनारे भोज वेटलैंड प्रोजेक्ट के तहत 2008 से 2013 के बीच बाउंड्रीवॉल और पाथ-वे का निर्माण किया गया था। करीब एक दशक बाद अब फिर से किनारों पर बड़े स्तर पर काम शुरू होने से सवाल खड़े हो गए हैं। बता दें कि पिछले करीब डेढ़ दशक में छोटा तालाब संरक्षण और सौंदर्यीकरण में 60 करोड़ से ज्यादा की रकम खर्च हो चुकी है। इसके बाद अब 6 करोड़ और खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन अब तक तालाब की सूरत नहीं बदली है।
मामले के एनजीटी पहुंचने के बाद अब नजर ट्रिब्यूनल में मामले की अगली सुनवाई पर टिकी है। यदि याचिका में उठाए गए बिंदुओं को गंभीर माना जाता है, तो चल रहे कार्यों पर रोक भी लग सकती है।
[breaking type="Breaking"]
छोटे तालाब की तर्ज पर नए शहर में मौजूद शाहपुरा झील में भी पिचिंग के नाम पर किनारों पर पत्थर डंप किए जा रहे हैं। यहां भी पाथ-वे निर्माण के साथ ही बाउंड्रीवॉल मेंटेनेंस किया जाना है। अधिकारियों ने बताया कि शाहपुरा झील से भी डी-सिल्टिंग कराई जाएगी।
छोटे तालाब में जो कार्य कराए जा रहे हैं, वे पूरी तरह संरक्षण और सुधार के उद्देश्य से हैं। पाथवे के आगे पिचिंग की जा रही है, उसका मकसद किनारों को मजबूत करना और सिल्ट जमा होने से रोकना है, न कि तालाब के जल क्षेत्र को कम करना।
प्रमोद मालवीय, प्रभारी, झील संरक्षण प्रकोष्ठ
छोटा तालाब (लोअर लेक) में जिस तरह पाथ-वे से आगे पत्थर डालकर पिचिंग की जा रही है, वह पूरी तरह से वैज्ञानिक दृष्टि से गलत है। तालाब के प्राकृतिक किनारे (नेचुरल शोरलाइन) को इस तरह बदलने से जल क्षेत्र धीरे-धीरे कम होगा और जलीय जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ेगा। पिचिंग के नाम पर पानी के हिस्से में अतिक्रमण करना संरक्षण नहीं बल्कि तालाब के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ है। इससे मछलियों, जलीय पौधों और माइक्रो ऑर्गेनिज्म का प्राकृतिक आवास खत्म होगा, जो पूरे इकोसिस्टम को प्रभावित करेगा। यदि सिल्ट रोकने और किनारों को मजबूत करने की जरूरत है, तो इसके लिए इको-फ्रेंडली और सॉफ्ट इंजीनियरिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, न कि भारी पत्थर डालकर हार्ड स्ट्रक्चर खड़ा करना।
राशिदनूर खान, एन्वायरमेंट एक्टिविस्ट