Climate Change Warning: धरती की बर्फ तेजी से पिघल रही है, वैज्ञानिकों ने दी दुनिया को चेतावनी; भारत पर भी मंडरा रहा खतरा

नई दिल्ली। जलवायु परिवर्तन का खतरा अब और करीब आता दिख रहा है। धरती के तापमान में बढ़ोतरी और बर्फ के तेजी से पिघलने को लेकर वैज्ञानिकों ने दुनिया के नेताओं को चेतावनी दी है। इंटरनेशनल क्रायोस्फीयर क्लाइमेट इनिशिएटिव (ICCI) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले वर्षों में वैश्विक तापमान के 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को अस्थायी रूप से पार करने का असर ग्लेशियरों, बर्फ की चादरों और समुद्री बर्फ पर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके परिणाम केवल ध्रुवीय और पहाड़ी इलाकों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि दुनिया के करोड़ों लोगों को प्रभावित कर सकते हैं।
1.5 डिग्री तापमान बढ़ने से क्या होगा?
'ओवरशूट एंड द क्रायोस्फीयर' नाम की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस ऊपर जाता है और बाद में घटता भी है, तब भी धरती के जमे हुए हिस्सों पर इसके गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। रिपोर्ट के मुख्य लेखक और ICCI के मुख्य वैज्ञानिक जेम्स किर्कहम ने कहा कि संकट बेहद करीब है। तापमान में आगे होने वाली बढ़ोतरी से इसके कई प्रभाव गंभीर हो सकते हैं और कुछ लंबे समय तक बने रह सकते हैं। क्रायोस्फीयर में धरती के वे हिस्से आते हैं, जहां पानी बर्फ के रूप में मौजूद रहता है। इसमें ग्लेशियर, बर्फ की विशाल चादरें और समुद्री बर्फ शामिल हैं।
समुद्र का जलस्तर बढ़ने से करोड़ों लोग प्रभावित होंगे
जेम्स किर्कहम के मुताबिक, आने वाले दशकों में समुद्र का जलस्तर बढ़ने से करोड़ों लोगों के सामने मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। समुद्र के स्तर में तेजी से बढ़ोतरी के कारण तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए खुद को बदलते हालात के अनुसार ढालना बड़ी चुनौती होगी। वहीं, पहाड़ी ग्लेशियरों के पिघलने से पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इससे बाढ़ और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा भी बढ़ सकता है। वैज्ञानिक ने नेपाल में हुई घटनाओं और 2023 में सिक्किम में आई आपदा का जिक्र करते हुए कहा कि पहाड़ों में बढ़ती अस्थिरता के संकेत पहले ही दिखाई दे रहे हैं।
परमाफ्रॉस्ट पिघलने से अस्थिर हो रहे पहाड़
रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़ते तापमान का असर पहाड़ी क्षेत्रों में भी दिखाई दे रहा है। ऊंचे पर्वतीय इलाकों में चट्टानों और मिट्टी को स्थिर रखने वाली जमी हुई परत को परमाफ्रॉस्ट कहा जाता है। तापमान बढ़ने से इसके पिघलने पर पहाड़ों की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। इसके चलते भूस्खलन, हिमस्खलन और पहाड़ों के ढहने जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। इनका असर केवल ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि निचले इलाकों में रहने वाले समुदायों को भी इसका सामना करना पड़ सकता है।
सूखा, बाढ़ और जंगल की आग का खतरा
किर्कहम ने समुद्री बर्फ के पिघलने और मौसम के बदलते पैटर्न को लेकर भी चिंता जताई। उनके अनुसार, इसके चलते सूखा, बाढ़ और जंगलों में आग जैसी चरम मौसमी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। दुनिया के कई हिस्सों में इस तरह की घटनाएं पहले ही देखने को मिल रही हैं।
वैज्ञानिकों ने दिए ये सुझाव
रिपोर्ट में प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए कई जरूरी कदम उठाने की सिफारिश की गई है। इनमें शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना, ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों की निगरानी बढ़ाना और ग्लेशियरों से जुड़े खतरों को बेहतर तरीके से समझना शामिल है। किर्कहम ने कहा कि मौजूदा निगरानी प्रणालियों का विस्तार करना जरूरी है, ताकि संभावित खतरों की समय रहते पहचान की जा सके। उन्होंने इस समस्या से निपटने के लिए देशों के बीच सहयोग पर भी जोर दिया। उनके मुताबिक, यह किसी एक देश की समस्या नहीं है। इसके लिए वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने, बर्फ पिघलने की रफ्तार धीमी करने और आपदाओं से निपटने की क्षमता विकसित करने की जरूरत है।




















