भोजशाला में उत्सव : शुक्रवार को हिंदूओं ने दिनभर की पूजा, सामूहिक आरती उतारी, 721 साल बाद ऐसा अवसर

धार। हाईकोर्ट के फैसले के बाद यह पहला मौका था जब शुक्रवार को हिंदू समाज भोजशाला में प्रवेश कर रहा था। ऐसे में सुरक्षा को लेकर खास इंतजाम भी पुलिस की तरफ से किए गए थे। सूर्योदय के साथ मां वाग्देवी के दर्शन-पूजन का कार्यक्रम शुरू हो गया था। सुबह के वक्त भोज उत्सव समिति के पदाधिकारियों ने मां वाग्देवी का प्रतिदिन अनुसार पूजन किया। मां वाग्देवी की आरती कर चुनरी ओढ़ाई गई। साथ ही गर्भगृह को फूलों से सजाया गया था। सुबह आरती के बाद दिनभर भक्तों के आने का क्रम चलता रहा। दूसरी ओर, मुस्लिम समाज ने प्रशासन की गाइडलाइन का पालन करते हुए स्थानीय मस्जिदों और घरों में जुमे की नमाज अदा की।

भोज उत्सव समिति ने संघर्ष को यादव किया
भोजशाला के गौरव की पुनर्स्थापना के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रही ‘भोज उत्सव समिति’ ने इस ऐतिहासिक दिन पर अपने पुराने संघर्ष को याद किया। वर्ष 2003 के आंदोलन के दौरान हुए लाठीचार्ज और गोलीबारी में जान गंवाने वाले तीन हिंदू युवकों को बलिदानी मानते हुए उनके परिजनों का सम्मान किया गया। अखंड ज्योति मंदिर के पास आंदोलन से जुड़े छोटे मुरारी बापू और बलिदानियों के परिजनों का पाद पूजन किया गया। महाआरती के बाद छोटे मुरारी बापू ने समाज को संबोधित करते हुए कहा कि सालों से हम जिस भोजशाला के लिए संघर्ष कर रहे थे, अब वह समाज की हो गई है।
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मुख्य याचिकाकर्ता लखनऊ से धार पहुंचे
इधर भोजशाला केस से जुड़े मुख्य याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी भी लखनऊ से धार पहुंचे थे। उन्होंने शुक्रवार को पूजा में सहभागिता कर मां वाग्दे्वी के दर्शन लाभ लिए। मीडिया से चर्चा में उन्होंने बताया कि अभी आगे और लड़ाई बाकी है। भोजशाला में भगवान की मूर्तियां है, उन्हें भी सम्मान दिलाना है। कुछ जगहों पर मुस्लिम चिह्न है, जो बाद में लगाए गए थे। उन्हें भी हटाने के लिए हमने मांग रखी है।

घरों और मस्जिदों में हुई नमाज
शहर काजी और सदर द्वारा एक दिन पहले ही समाज से शांति बनाए रखने और गाइडलाइन का पालन करने की अपील की गई थी, जिसका व्यापक असर शुक्रवार को देखने को मिला। दोपहर 1 बजे के बाद मुस्लिम समाज के लोग अपने घरों से निकले और अपने-अपने मोहल्लों व गलियों की मस्जिदों में जुमे की नमाज अदा की। फैसले के विरोध में मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों के व्यापारियों ने अपने प्रतिष्ठान और दुकानें पूरी तरह बंद रखीं। वहीं, कुछ युवाओं ने अपनी बांह पर काली पट्टी बांधकर शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज कराया। सदर अब्दुल समद के अनुसार 700 सालों के इतिहास में पहली बार वहां पर जुमे की नमाज अदा करने से वंचित किया गया है। यह अल्पसंख्यकों और मुस्लिम समाज के अधिकारों का हनन है और हमारी बात को दबाने की कोशिश है।

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