आज के समय में रिश्तों की परिभाषा सिर्फ पुरुष और महिला तक सीमित नहीं रह गई है। अब होमोसेक्सुअल और बाइसेक्शुअल रिश्ते तेजी से सामने आ रहे हैं। पहले भी समाज में ऐसे रिश्ते मौजूद थे, लेकिन अब लोग खुलकर इसे स्वीकार करने लगे हैं।
लेटेस्ट रिपोर्ट के अनुसार, 1990 के बाद से बाइसेक्शुअल रिश्तों की संख्या तीन गुना बढ़ गई है। भारत में भी स्थिति अलग नहीं है। अलग-अलग रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में समलैंगिक लोगों की संख्या 5 करोड़ से 20 करोड़ तक बताई जाती है।
समलैंगिकता के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इसमें हॉर्मोनल बदलाव भी शामिल हैं। शोध बताते हैं कि गर्भावस्था के दौरान प्रेनेटल एंड्रोजन का स्तर बच्चे को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में संरचनात्मक अंतर भी समलैंगिक लोगों में पाए गए हैं।
हालांकि, हॉर्मोन ही अकेला कारण नहीं है। व्यक्तिगत अनुभव, पालन-पोषण और सामाजिक-सांस्कृतिक कारण भी इसमें भूमिका निभाते हैं। यही वजह है कि हर व्यक्ति का अनुभव अलग होता है।
कुछ मामलों में जन्म के समय टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का स्तर असामान्य होने से समलैंगिक व्यवहार विकसित होने की संभावना बढ़ सकती है। उदाहरण के लिए:
लड़कों में टेस्टोस्टेरोन की कमी होने पर आवाज पतली हो सकती है, लोग उनसे घुलने-मिलने में कम दिलचस्पी ले सकते हैं, और वे लड़कों से कम बात कर सकते हैं।
लड़कियों में टेस्टोस्टेरोन का स्तर अधिक होने पर शरीर में बदलाव आ सकते हैं, आवाज भारी हो सकती है, चेहरे पर बाल बढ़ सकते हैं और शरीर अन्य लड़कियों की तुलना में भारी दिख सकता है।
इसका मतलब यह नहीं कि कोई बीमारी है। यह सिर्फ हॉर्मोन और जैविक कारणों का परिणाम है।
2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने सेक्शन 377 को असंवैधानिक घोषित किया, जो समलैंगिकता को अपराध मानता था। यह एक बड़ा बदलाव था। लेकिन सामाजिक स्तर पर भेदभाव अभी भी मौजूद है।
कई बार लोग या परिवार समलैंगिकों को स्वीकार नहीं करते और उनका मजाक उड़ाते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि यौन अभिवृत्ति हर व्यक्ति की निजी पसंद है। किसी भी व्यक्ति की यौन पहचान या पसंद का मजाक बनाना गलत है।
समलैंगिक लोगों को सम्मान देना और उनके साथ समान व्यवहार करना समाज के लिए जरूरी है। यह किसी बीमारी का नतीजा नहीं है, बल्कि हॉर्मोन, अनुभव और व्यक्तिगत पसंद का हिस्सा है।