Peoples Update Special :भोपाल की हवा हुई साफ या सिर्फ आंकड़ों का खेल? पुअर एयर डे 5.6% से घटकर 2.96% हुए, जमीनी हालात पर विशेषज्ञों ने उठाए सवाल

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) का दावा है कि पिछले चार वर्षों में भोपाल की हवा की गुणवत्ता में लगातार सुधार हुआ है। विभाग के अनुसार, शहर में 'पुअर एयर क्वालिटी' (खराब हवा) वाले दिनों की संख्या लगातार कम हुई है। वर्ष 2022 में जहां करीब 5.6% दिन खराब श्रेणी में दर्ज किए गए थे, वहीं वर्ष 2026 में यह आंकड़ा घटकर 2.96% रह गया है। हालांकि इस दावे पर पर्यावरण विशेषज्ञ और स्वास्थ्य विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि शहर में मेट्रो निर्माण, सड़क चौड़ीकरण, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और लगातार बढ़ते वाहनों के बीच हवा के साफ होने का दावा वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाता।
क्या होता है पुअर एयर डे?
एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) में 'पुअर' श्रेणी का मतलब ऐसी हवा से है, जिससे सांस संबंधी बीमारियां, एलर्जी और फेफड़ों की समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार ऐसे दिनों में लगातार कमी आना शहर के लिए सकारात्मक संकेत है।
सरकारी आंकड़े बनाम जमीनी हकीकत
जहां सरकारी रिपोर्ट हवा में सुधार की बात कर रही है, वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में शहर में पेट्रोल और डीजल वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ी है। मेट्रो परियोजना, सड़क निर्माण और अन्य बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर कार्यों के कारण धूल भी पहले की तुलना में अधिक उड़ रही है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, अस्पतालों में सांस और एलर्जी से जुड़े मरीजों की संख्या भी करीब 28 से 30 प्रतिशत तक बढ़ी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब प्रदूषण बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं तो सरकारी रिकॉर्ड में हवा कैसे साफ हो रही है।
पुअर एयर डे कम होने से मिलती है ज्यादा ग्रांट
विशेषज्ञों के मुताबिक केंद्र सरकार की नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) योजना के तहत शहरों को प्रदूषण नियंत्रण के लिए अनुदान (ग्रांट) दिया जाता है। इस योजना में एक महत्वपूर्ण मानक 'पुअर एयर डे' की संख्या होती है। जिस शहर में खराब हवा वाले दिनों की संख्या कम होती है, उसे बेहतर प्रदर्शन के आधार पर अधिक वित्तीय सहायता मिलने की संभावना रहती है।
शहर में 20 जगह होगी हवा की जांच
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अब शहर में हवा की निगरानी का दायरा बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। विभाग जल्द ही 20 स्थानों पर पोर्टेबल एयर क्वालिटी मॉनिटर लगाने जा रहा है। फिलहाल शहर में पर्यावरण परिसर, टीटी नगर और कलेक्टोरेट में रियल टाइम एयर क्वालिटी मॉनिटर संचालित है जबकि चार अन्य स्थानों पर मैन्युअल तरीके से हवा की गुणवत्ता की जांच की जाती है।
विशेषज्ञ बोले- सीमित मॉनिटरिंग से पूरी तस्वीर नहीं मिलती
रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ रेस्पिरेटरी डिजीज (RIRD) के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. पराग शर्मा के अनुसार, कुछ वर्ष पहले जहां ओपीडी में प्रतिदिन लगभग 250 मरीज आते थे वहीं अब यह संख्या बढ़कर करीब 350 पहुंच गई है। उनका कहना है कि जिन इलाकों में मेट्रो और बड़े निर्माण कार्य चल रहे हैं, वहां सांस संबंधी बीमारियां अधिक देखने को मिल रही हैं। वहीं ऑटोमोबाइल विशेषज्ञ पुनीत बिष्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में भोपाल में पेट्रोल और डीजल वाहनों की संख्या करीब 11 लाख थी, जो 2025 तक बढ़कर लगभग 12 लाख हो गई। उनका मानना है कि वाहनों से निकलने वाला धुआं और बढ़ता ट्रैफिक प्रदूषण की बड़ी वजह है।
पर्यावरणविद् ने उठाए आंकड़ों पर सवाल
पर्यावरणविद् डॉ. सुभाष सी. पांडे का कहना है कि भोपाल में प्रदूषण मापने के केंद्र अभी भी सीमित हैं। चुनिंदा इलाकों के आधार पर पूरे शहर की हवा का आकलन किया जा रहा है, जबकि जिन क्षेत्रों में निर्माण कार्य और ट्रैफिक सबसे ज्यादा है, वहां नियमित मॉनिटरिंग नहीं होती। उनके अनुसार इसी वजह से विभागीय आंकड़ों में सुधार दिखाई देता है जबकि आम लोगों को जमीन पर धूल और प्रदूषण पहले से ज्यादा महसूस हो रहा है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने क्या कहा?
एमपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रीजनल ऑफिसर नितेश चौरसिया का कहना है कि लगातार मॉनिटरिंग, औद्योगिक इकाइयों की जांच और प्रदूषण नियंत्रण उपायों के कारण भोपाल की हवा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। उनके अनुसार पिछले वर्षों की तुलना में खराब श्रेणी वाले दिनों में लगातार कमी दर्ज की गई है।
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AQI क्या होता है?
एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) हवा की गुणवत्ता मापने का वैज्ञानिक पैमाना है। इसमें PM10, PM2.5, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे प्रदूषकों का स्तर मापा जाता है।
0-50: अच्छी हवा
51-100: संतोषजनक
101-200: मध्यम
201-300: खराब
301-400: बहुत खराब
401-500: गंभीर
स्वास्थ्य विभाग की चिंता
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार शहर में एलर्जी और सांस संबंधी मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बच्चों और बुजुर्गों में फेफड़ों से जुड़ी समस्याएं पहले की तुलना में अधिक सामने आ रही हैं। वहीं धूल प्रभावित इलाकों में अस्थमा के मामलों में भी वृद्धि दर्ज की जा रही है।
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ऐसे सुधर रही हवा की सेहत
| केटेगरी | 2023 | 2024 | 2025 | 2026 |
| अच्छी हवा | 15.9% | 15.1% | 14.8% | 00% |
| संतोषजनक | 26% | 25.1% | 25.8% | 19.8% |
| मध्यम | 50% | 51.3% | 52.2% | 71.7% |
| खराब | 5.1% | 4.4% | 3.5% | 2.96% |
| बहुत खराब | 2.7% | 1.5% | 3.5% | 00% |
| गंभीर श्रेणी | 00% | 00% | 00% | 00% |












