कबूलनामे के आधार पर हिरासत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, यूपी सरकार पर 10 लाख की कॉस्ट

संभल हिंसा मामले में आरोपी मुल्ला अफरोज की प्रिवेंटिव डिटेंशन को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार पर 10 लाख रुपए की कॉस्ट लगाई है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस हिरासत में आरोपी की ओर से दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश नहीं दिया जा सकता। मुल्ला अफरोज ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
पुलिस हिरासत में दिए कबूलनामे पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को आधार बनाकर नेशनल सिक्योरिटी एक्ट यानी NSA के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश दिया जा सकता है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यूपी सरकार से इसी आधार पर सवाल किया था। मुल्ला अफरोज को 2024 की संभल हिंसा के मामले में आरोपी बनाया गया था। यह हिंसा संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई थी, जिसमें चार लोगों की मौत हुई थी। मुल्ला अफरोज ने अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए कहा था कि उन्हें हिंसा के मामले में बाद में कथित कबूलनामे के आधार पर जोड़ा गया।
13 अक्टूबर 2025 को NSA के तहत हिरासत
मुल्ला अफरोज को 13 अक्टूबर 2025 को NSA की धारा 3(2) के तहत हिरासत में लिया गया था। यूपी सरकार की तरफ से इलाहाबाद हाईकोर्ट में कहा गया था कि हिंसा के बाद इलाके में कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक शांति पर असर पड़ा था। सरकार के मुताबिक, उपलब्ध सामग्री के आधार पर उन्हें भविष्य में ऐसी गतिविधियों से रोकने के लिए प्रिवेंटिव डिटेंशन जरूरी था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में मुल्ला अफरोज की याचिका खारिज कर दी थी। कोर्ट ने कहा था कि हिरासत का आदेश संबंधित अधिकारी की 'सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन' और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिया गया था। इसके बाद मुल्ला अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
8 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला रखा था सुरक्षित
मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने की। सुप्रीम कोर्ट ने 8 सितंबर को मामले में सुनवाई पूरी करने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। उस सुनवाई के दौरान कोर्ट ने खास तौर पर पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे की प्रासंगिकता और उसके आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन की वैधता पर सवाल उठाए थे। मुल्ला अफरोज की याचिका सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन के तौर पर दाखिल हुई थी। कोर्ट रिकॉर्ड के मुताबिक, मामले में यूपी सरकार और संभल के जिला मजिस्ट्रेट समेत अन्य अधिकारी प्रतिवादी हैं। अब सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार पर 10 लाख रुपए की कॉस्ट लगाई है और कहा है कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश नहीं दिया जा सकता।




















