शादी से पहले बने रिश्ते 'चरित्रहीनता' की पहचान नहीं,सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि अगर दो बालिग और अविवाहित लोग अपनी मर्जी से किसी रिश्ते में हैं, तो सिर्फ इसी आधार पर उनके चरित्र पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। अदालत ने साफ किया कि शादी से पहले बने आपसी सहमति वाले संबंध किसी व्यक्ति को खराब चरित्र वाला साबित नहीं करते। यह टिप्पणी जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल भर्ती से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की। कोर्ट ने उम्मीदवार गजुला तिरुपति को राहत देते हुए भर्ती बोर्ड के फैसले और उसकी सोच पर भी सवाल उठाए।
क्या था पूरा मामला?
मामला एक ऐसे उम्मीदवार से जुड़ा था, जिसका चयन पुलिस कांस्टेबल पद के लिए हो गया था। हालांकि बाद में उसकी उम्मीदवारी रद्द कर दी गई। भर्ती बोर्ड का कहना था कि उम्मीदवार पहले एक आपराधिक मामले में आरोपी रह चुका है, इसलिए उसे पुलिस सेवा के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता। रिकॉर्ड के अनुसार, उम्मीदवार पर आरोप था कि उसने अपनी पड़ोस में रहने वाली एक युवती से शादी का वादा किया और लंबे समय तक उसके साथ संबंध बनाए। बाद में उसने किसी दूसरी महिला से विवाह कर लिया। इस मामले को लेकर शिकायत दर्ज हुई थी, लेकिन वर्ष 2015 में यह विवाद लोक अदालत के माध्यम से समझौते के साथ समाप्त हो गया था।
अदालत ने भर्ती बोर्ड के फैसले पर उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि उम्मीदवार ने भर्ती प्रक्रिया में अपने खिलाफ दर्ज मामले की जानकारी छिपाई नहीं थी। उसने सत्यापन फॉर्म में स्वयं इस मामले का उल्लेख किया था। इसके बावजूद भर्ती बोर्ड ने उसे "नैतिक अधमता" से जुड़ा मामला मानते हुए सेवा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर आपत्ति जताते हुए कहा कि किसी भी नियोक्ता को उम्मीदवार की उपयुक्तता पर निर्णय लेने का अधिकार जरूर है, लेकिन यह फैसला तथ्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए, न कि अनुमान के आधार पर। अदालत ने कहा कि भर्ती बोर्ड ने यह मान लिया था कि लोक अदालत में हुआ समझौता अपराध स्वीकार करने के बराबर है, जबकि ऐसा मानने के लिए कोई ठोस आधार मौजूद नहीं था।
विवाह-पूर्व संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
फैसले के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने समाज में बदलती परिस्थितियों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि आज के समय में दो वयस्क और अविवाहित लोगों के बीच आपसी सहमति से संबंध बनना असामान्य बात नहीं है। पीठ ने कहा कि ऐसे संबंधों के आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र को लेकर नकारात्मक धारणा नहीं बनाई जानी चाहिए। अदालत के अनुसार, केवल इस वजह से किसी व्यक्ति को खराब नैतिक चरित्र वाला नहीं कहा जा सकता कि उसका विवाह से पहले किसी के साथ सहमति से संबंध रहा हो। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने कहा कि भारतीय कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो दो बालिग और सहमत व्यक्तियों को अपनी पसंद का संबंध बनाने से रोकता हो।
हर प्रेम संबंध शादी तक पहुंचे, यह जरूरी नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि हर प्रेम संबंध का अंत विवाह में हो, यह जरूरी नहीं है। कई बार रिश्ते अलग-अलग कारणों से आगे नहीं बढ़ पाते और उनका अंत हो जाता है। अदालत ने कहा कि केवल इसलिए किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि संबंध शादी तक नहीं पहुंचा। यदि दो लोगों के बीच रिश्ता आपसी सहमति से बना था, तो बाद में विवाह न होने को अपने आप में धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता। पीठ ने माना कि किसी रिश्ते के टूटने को सीधे तौर पर चरित्र या नैतिकता से जोड़ना उचित नहीं है।
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उम्मीदवार को मिली राहत
सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती बोर्ड की स्क्रीनिंग समिति के फैसले को मनमाना करार दिया। अदालत ने माना कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उम्मीदवार को सेवा से बाहर करना उचित नहीं था। इसके साथ ही कोर्ट ने तेलंगाना हाई कोर्ट की एकल पीठ के पहले दिए गए आदेश को बहाल कर दिया। अदालत ने संबंधित अधिकारियों को उम्मीदवार की नियुक्ति पर दोबारा विचार करने का निर्देश भी दिया।












