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बारिश में चिता बुझने लगी तो तिरपाल लेकर खड़े हो गए लोग, महाराष्ट्र के इस आदिवासी गांव में नहीं है श्मशान

महाराष्ट्र के ठाणे के उंभरई गांव में श्मशान नहीं होने से जयाबाई महादू वाघ का अंतिम संस्कार खुले मैदान में किया गया। तेज बारिश में चिता बुझने लगी तो ग्रामीणों ने तिरपाल तानकर अंतिम संस्कार पूरा कराया। ग्रामीण पिछले दो साल से श्मशान की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक समस्या का समाधान नहीं हुआ है।
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बारिश में चिता बुझने लगी तो तिरपाल लेकर खड़े हो गए लोग, महाराष्ट्र के इस आदिवासी गांव में नहीं है श्मशान

महाराष्ट्र के ठाणे जिले के शाहपुर से सामने आई एक तस्वीर गांवों में बुनियादी सुविधाओं की हकीकत दिखाती है। यहां एक महिला की मौत के बाद जब अंतिम संस्कार शुरू हुआ तो अचानक तेज बारिश होने लगी। चिता की आग बुझने लगी तो ग्रामीणों ने तिरपाल तानकर उसे बारिश से बचाया। लोग खुद बारिश में भीगते रहे, लेकिन कोशिश रही कि किसी तरह अंतिम संस्कार पूरा हो सके। यह मामला शाहपुर तालुका के उंभरई गांव की आदिवासी बस्ती का है, जहां ग्रामीणों के मुताबिक आज तक श्मशान भूमि की व्यवस्था नहीं हो पाई है। इसी वजह से लोगों को अपने परिजनों का अंतिम संस्कार खुले मैदान में करना पड़ता है। बारिश के मौसम में यह परेशानी और भी गंभीर हो जाती है।

बीमारी से हुई जयाबाई महादू वाघ की मौत

उंभरई गांव की ग्राम पंचायत समिति की सदस्य जयाबाई महादू वाघ की बीमारी के चलते मौत हो गई थी। मंगलवार को गांव के पास खुले मैदान में उनके अंतिम संस्कार की तैयारी की गई। अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हुई ही थी कि इलाके में तेज बारिश होने लगी। बारिश इतनी तेज थी कि चिता की आग पर भी असर पड़ने लगा। आग बुझने की स्थिति में पहुंची तो ग्रामीणों ने चिता के ऊपर तिरपाल तान दिया। कुछ लोग तिरपाल को चारों तरफ से पकड़कर खड़े रहे, ताकि बारिश का पानी सीधे चिता पर न गिरे। इस दौरान ग्रामीण खुद बारिश में खड़े रहे और किसी तरह अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की गई।

गांव में नहीं है श्मशान, खुले मैदान में होता है अंतिम संस्कार

ग्रामीणों का कहना है कि उंभरई की आदिवासी बस्ती में श्मशान भूमि नहीं है। करीब 100 लोगों की आबादी वाली इस बस्ती के लोगों को किसी की मौत होने पर खुले मैदान में अंतिम संस्कार करना पड़ता है। गर्मी के मौसम में तो किसी तरह यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है, लेकिन बारिश के दिनों में स्थिति काफी मुश्किल हो जाती है। खुले मैदान में कीचड़ और पानी के बीच चिता जलाना आसान नहीं होता। ऐसे में परिवार और ग्रामीणों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जयाबाई महादू वाघ के अंतिम संस्कार के दौरान सामने आई तस्वीर ने इसी समस्या को एक बार फिर सामने ला दिया है।

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दो साल से श्मशान की मांग, फिर भी नहीं बनी व्यवस्था

ग्रामीणों के मुताबिक, गांव में श्मशान भूमि की व्यवस्था के लिए पिछले करीब दो साल से प्रशासन से मांग की जा रही है। उनका कहना है कि करीब दो साल पहले शाहपुर के तत्कालीन तहसीलदार परमेश्वर कालूसे ने भी गांव में श्मशान के लिए जगह देखी थी। उस समय ग्रामीणों को जल्द श्मशान बनाने का भरोसा दिया गया था। हालांकि, ग्रामीणों का दावा है कि दो साल बीतने के बाद भी जमीन और श्मशान की समस्या का समाधान नहीं हुआ है। अब सवाल यह है कि जिस बस्ती में लोगों को अपने मृत परिजनों का अंतिम संस्कार करने के लिए भी खुले मैदान पर निर्भर रहना पड़ रहा है, वहां बुनियादी सुविधा कब पहुंचेगी।

बारिश में शव तक ले जाना बन जाता है चुनौती

ग्रामीणों की परेशानी सिर्फ श्मशान की कमी तक सीमित नहीं है। शाहपुर तालुका के दूरदराज के इलाकों में सड़क और आवाजाही की सुविधा भी कई जगहों पर बड़ी समस्या बनी हुई है। ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों का दावा है कि शाहपुर तालुका के 250 से ज्यादा गांवों में श्मशान भूमि से जुड़ी समस्या है। कहीं अंतिम संस्कार के लिए जमीन उपलब्ध नहीं है तो कहीं बजट की कमी बताई जाती है। शाहपुर तालुका में 110 ग्राम पंचायतें, 227 राजस्व गांव और 414 अन्य ग्रामीण बस्तियां हैं। दूरदराज के कई इलाकों में सड़कें भी नहीं हैं। बरसात के दिनों में स्थिति और खराब हो जाती है। कई जगह ग्रामीणों को शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाने के दौरान नाले या नदी पार करनी पड़ती है।

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विकास के दावों के बीच बुनियादी सुविधाओं पर सवाल

शाहपुर में एक तरफ बड़े विकास कार्यों की बातें होती हैं, लेकिन दूसरी तरफ आदिवासी बस्तियों में लोग सड़क, पानी, बिजली और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं। अब श्मशान जैसी जरूरी सुविधा भी इस सूची में शामिल है। जयाबाई महादू वाघ के अंतिम संस्कार की तस्वीर ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा किया है। किसी व्यक्ति की आखिरी विदाई भी अगर मौसम और सुविधाओं की कमी से जूझते हुए करनी पड़े, तो यह सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं रह जाती। ग्रामीणों की मांग है कि उंभरई में जल्द श्मशान भूमि की व्यवस्था की जाए। इसके साथ ही सड़क और दूसरी जरूरी सुविधाओं पर भी काम किया जाए, ताकि बारिश के मौसम में लोगों को अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए ऐसी मुश्किल परिस्थितियों का सामना न करना पड़े।

Sona Rajput
By Sona Rajput

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन किया है। साल 2022 ...Read More

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