एक तरफ दादी की तेरहवीं, दूसरी तरफ पोते की अर्थी...'एक बार आंख खोल लो बेटा' कहकर बिलखती रही मां, दर्दनाक हादसे ने तोड़ दिया हर दिल

कानपुर के दो परिवारों में बुधवार को ऐसा दर्द पसरा था, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। लखनऊ के भीषण अग्निकांड में जान गंवाने वाले संयम विज और सूरजभान सिंह के पार्थिव शरीर जब उनके घर पहुंचे तो पूरे मोहल्ले में मातम छा गया। जिन बेटों के लौटने का परिवार इंतजार कर रहा था, वे अब हमेशा के लिए खामोश होकर घर लौटे थे। घरों के बाहर लोगों की भीड़ थी, लेकिन किसी के पास सांत्वना देने के लिए शब्द नहीं थे। हर आंख नम थी और हर चेहरा गम में डूबा हुआ था।
मां की चीख सुन रो पड़ा पूरा मोहल्ला
संयम विज का शव घर पहुंचते ही उनकी मां खुद को संभाल नहीं सकीं। बेटे को सामने देखकर वह बार-बार बेहोश हो रही थीं। बहनों और रिश्तेदारों का भी रो-रोकर बुरा हाल था। अंतिम यात्रा शुरू होने से पहले जब परिजन पार्थिव शरीर को लेकर जाने लगे तो मां अर्थी से लिपट गईं। वह बिलखते हुए कह रही थीं कि मेरे लाल को मत ले जाओ... एक बार आंख खोल लो बेटा... वापस आ जाओ। मां की यह पुकार सुन वहां मौजूद लोगों की आंखें भी भर आईं। कई लोग अपने आंसू नहीं रोक सके।
तेरहवीं की तैयारी थी, घर में अंतिम संस्कार की नौबत आ गई
संयम विज के परिवार पर दुख का पहाड़ एक बार नहीं, बल्कि दो बार टूटा। कुछ दिन पहले ही उनकी दादी का निधन हुआ था। मंगलवार को घर में उनकी तेरहवीं का कार्यक्रम होना था। परिवार उसी की तैयारियों में जुटा था, लेकिन शाम तक हालात पूरी तरह बदल गए। जिस घर में दादी की आत्मा की शांति के लिए पूजा की तैयारी हो रही थी, उसी घर में युवा बेटे की अंतिम यात्रा की तैयारी शुरू हो गई। एक ही परिवार में कुछ दिनों के भीतर दूसरी मौत ने सभी को अंदर तक झकझोर दिया।
हर रविवार घर आने वाला बेटा अब नहीं लौटेगा
25 वर्षीय सूरजभान सिंह नौकरी के सिलसिले में लखनऊ में रहते थे। परिवार के मुताबिक वह हर सप्ताह घर जरूर आते थे। मां को हमेशा उनके लौटने का इंतजार रहता था। इस बार भी वह काम पर गए थे, लेकिन वापस नहीं लौट सके। सूरजभान के पिता का पहले ही निधन हो चुका है। घर की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थी। मां और छोटे भाई की उम्मीदें उनसे जुड़ी थीं, लेकिन एक हादसे ने पूरे परिवार की दुनिया बदल दी।
फोन आया और छोटे भाई की दुनिया उजड़ गई
हादसे के समय सूरजभान का छोटा भाई ऋषिकेश में था। उसे फोन पर दुर्घटना की सूचना मिली तो पहले विश्वास नहीं हुआ। कुछ देर बाद जब सच्चाई सामने आई तो वह तुरंत घर के लिए रवाना हो गया। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। जिस भाई के साथ उसने बचपन बिताया था, अब उसकी यादें ही उसके साथ रह गई हैं।
साथ काम करते थे, साथ ही चली गई जिंदगी
संयम विज और सूरजभान सिंह एक ही एनीमेशन स्टूडियो में काम करते थे। दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी। साथ काम करना, भविष्य की योजनाएं बनाना और आगे बढ़ने के सपने देखना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। दोनों दोस्तों की अंतिम यात्रा लगभग एक साथ निकली। मोहल्ले के लोगों का कहना है कि दोनों का स्वभाव बेहद मिलनसार था और वे हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते थे।
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सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
संयम के मामा ने हादसे को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जिस बिल्डिंग में दोनों काम करते थे, वहां ऑटोमैटिक सेंसर गेट लगे थे, लेकिन आग लगने के दौरान वे समय पर नहीं खुले। धुआं तेजी से फैलता गया और अंदर फंसे लोग बाहर निकलने के लिए संघर्ष करते रहे। परिजनों का मानना है कि अगर सुरक्षा इंतजाम बेहतर होते तो कई लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
नम आंखों से दी गई अंतिम विदाई
दोनों युवकों की अंतिम यात्रा में सैकड़ों लोग शामिल हुए। किसी ने फूल अर्पित किए तो किसी ने हाथ जोड़कर अंतिम प्रणाम किया। पूरे इलाके में शोक का माहौल था। अंतिम यात्रा के दौरान लगातार सिसकियों की आवाजें सुनाई देती रहीं। लोगों के मन में एक ही सवाल था कि जिन परिवारों ने अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के सपने देखे थे, आखिर उनकी क्या गलती थी। संयम और सूरजभान की मौत ने न सिर्फ दो परिवारों को, बल्कि पूरे मोहल्ले को गहरे दुख में डुबो दिया।












