
प्रयागराज के जीरो रोड को ज्यादातर लोग बस अड्डे के रूप में जानते हैं, जहां से न केवल आसपास के जिलों बल्कि मध्य प्रदेश जाने वाली बसें भी गुजरती हैं। लेकिन जो प्रयागराज की असली रूह से वाकिफ हैं, वे जानते हैं कि यह इलाका सिर्फ बसों का नहीं, बल्कि बुद्धिजीवियों की अड्डेबाजी का भी बड़ा केंद्र है।
यहां पान खाकर गरजती आवाजों में बहस करने वाले लोग बनारस की याद दिला सकते हैं, लेकिन जब वही बहस किसी गहरी बौद्धिक चर्चा में बदल जाती है, तब समझ आता है कि यह प्रयागराज है। इसी अड्डेबाजी के एक दिग्गज हैं खूंटी गुरु, जो 28 जनवरी को महाकुंभ की भगदड़ के बाद से लापता हो गए थे।
भगदड़ के बाद गायब हो गए थे खूंटी गुरु
महाकुंभ की भीड़ और भगदड़ के बाद से ही खूंटी गुरु का कोई अता-पता नहीं था। शुभचिंतकों ने मान लिया कि शायद वे भी इस भगदड़ में सद्गति को प्राप्त हो गए। चूंकि उनका दुनिया में कोई और करीबी नहीं था, न ही कोई संपत्ति थी, इसलिए मोहल्ले के लोगों ने तय किया कि उनकी आत्मा की शांति के लिए तेरहवीं का आयोजन किया जाए।
तय हुआ कि 11 फरवरी को उनकी तेरहवीं की जाएगी। यह जिम्मेदारी मोहल्ले के ही बिज्जू महाराज ने उठाई।
लेकिन तेरहवीं से ठीक पहले प्रकट हो गए खूंटी गुरु!
जब सब लोग खूंटी गुरु की तेरहवीं की तैयारियों में लगे थे, तभी अचानक वे प्रकट हो गए। उन्होंने बताया कि वे मेले में ही किसी साधुओं के साथ भजन-कीर्तन में लीन थे। दरअसल, महाकुंभ के दौरान गंगा स्नान और भजन के साथ-साथ भोजन की भी कोई कमी नहीं होती। इसी कारण वे मेले में ही भक्ति और भंडारे का आनंद उठा रहे थे।
खूंटी गुरु ने कहा, लोक-परलोक का लाभ उठा रहे थे
खूंटी गुरु से जब पूछा गया कि वे इतने दिनों तक कहां थे, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “144 साल बाद ऐसा योग आया था, जिसमें गंगा स्नान, भजन और भोजन सब कुछ था। लोक-परलोक का लाभ उठाने का इससे बेहतर अवसर और कहां मिलता?”
अड्डेबाजों की चौपाल फिर से सजी
अब जब खूंटी गुरु लौट आए हैं, तो जीरो रोड की बैठकबाजी फिर से गुलजार हो गई है। मोहल्ले के लोग फिर से चबूतरों पर बैठकर राजनीति, समाज और देश-दुनिया के मुद्दों पर लंबी-लंबी बहस करने में जुट गए हैं।