Internet Shutdown :क्या सरकार कभी भी रोक सकती है मोबाइल डेटा? जानिए सुप्रीम कोर्ट का नियम

दिल्ली के कनॉट प्लेस और जंतर-मंतर के आसपास CJP आंदोलन के दौरान गुरुवार (23 जुलाई) शाम सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए। जंतर-मंतर के करीब 1.5 किलोमीटर इलाके में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं। एहतियात के तौर पर कई दुकानदारों ने बाजार भी तय समय से पहले बंद कर दिए। इंटरनेट बंद होने का सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ा। UPI और कार्ड से भुगतान बंद हो गया, जिससे लोगों को नकद पैसे देने पड़े। कई पार्किंग स्थलों पर पहले ही पूछा जा रहा था कि वाहन चालकों के पास कैश है या नहीं।
UPI, कैब और रोजमर्रा की सेवाएं हुईं प्रभावित
मोबाइल इंटरनेट बंद होने से ऐप आधारित कैब और ऑटो सेवाएं भी प्रभावित रहीं। ऑनलाइन बुकिंग और डिजिटल पेमेंट नहीं हो सके। मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदियों और इंटरनेट बंद होने से लोगों को अस्पताल, दफ्तर और दूसरे जरूरी स्थानों तक पहुंचने में परेशानी हुई। कई यात्रियों को नकदी निकालने के लिए एटीएम ढूंढने पड़े।
क्या सरकार इंटरनेट बंद कर सकती है?
ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि क्या सरकार किसी भी समय इंटरनेट बंद कर सकती है?
जवाब है- हां, लेकिन कुछ कानूनी शर्तों के साथ। सरकार कानून-व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा या हिंसा रोकने जैसी गंभीर परिस्थितियों में सीमित समय के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद कर सकती है। हालांकि यह अधिकार असीमित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
जनवरी 2020 में अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट शटडाउन को लेकर अहम फैसला सुनाया था। यह मामला जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद लंबे समय तक इंटरनेट बंद रहने से जुड़ा था। अदालत ने कहा कि आज इंटरनेट केवल बातचीत का माध्यम नहीं है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार का भी महत्वपूर्ण साधन बन चुका है। इसलिए इंटरनेट पर लगाया गया कोई भी प्रतिबंध न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएगा।
अनिश्चितकाल तक इंटरनेट बंद नहीं रखा जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि सरकार इंटरनेट बंद कर सकती है, लेकिन केवल कानून के तहत, उचित कारणों से और सीमित समय के लिए। बिना समय सीमा के इंटरनेट बंद रखना संविधान के अनुरूप नहीं माना जाएगा।
हर आदेश सार्वजनिक होना जरूरी
अदालत ने यह भी कहा कि इंटरनेट बंद करने से जुड़े सभी सरकारी आदेश सार्वजनिक किए जाने चाहिए। लोगों को यह जानने का अधिकार है कि इंटरनेट क्यों बंद किया गया और उसके पीछे क्या वजह है। लोकतंत्र में ऐसे आदेश गोपनीय नहीं रखे जा सकते।
इंटरनेट बंद करना आखिरी विकल्प होना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने 'प्रोपोर्शनैलिटी' यानी अनुपातिकता के सिद्धांत पर जोर दिया। अदालत के अनुसार, यदि कम कठोर उपायों से स्थिति संभाली जा सकती है तो पूरे इलाके का इंटरनेट बंद करना उचित नहीं होगा। उदाहरण के तौर पर, यदि केवल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर रोक लगाकर स्थिति नियंत्रित की जा सकती है, तो पूरे मोबाइल इंटरनेट नेटवर्क को बंद करना सही विकल्प नहीं माना जाएगा।
दिल्ली से मणिपुर तक कई बार लगा इंटरनेट शटडाउन
पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, हरियाणा, राजस्थान और पंजाब समेत कई राज्यों में हिंसा या विरोध प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट सेवाएं अस्थायी रूप से बंद की गई हैं। प्रशासन हर बार सार्वजनिक व्यवस्था और अफवाहों पर रोक लगाने का कारण बताता है। हालांकि, हर बार यह बहस भी होती है कि इंटरनेट बंद करने से हिंसा रुकती है या इसका सबसे ज्यादा नुकसान आम लोगों और कारोबार को उठाना पड़ता है।
डिजिटल अर्थव्यवस्था पर पड़ता है बड़ा असर
आज भारत में करोड़ों लोग डिजिटल भुगतान पर निर्भर हैं। इंटरनेट बंद होने से UPI, ऑनलाइन बैंकिंग, ई-कॉमर्स, कैब सेवाएं, फूड डिलीवरी, अस्पताल, ऑनलाइन पढ़ाई और छोटे कारोबार सीधे प्रभावित होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार इंटरनेट शटडाउन होने से करोड़ों रुपये का आर्थिक नुकसान होता है और देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ता है।
सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी
सरकार का कहना है कि संवेदनशील हालात में इंटरनेट के जरिए अफवाहें और भड़काऊ संदेश तेजी से फैल सकते हैं, इसलिए अस्थायी प्रतिबंध जरूरी हो सकते हैं। वहीं, डिजिटल अधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि पूरे क्षेत्र में इंटरनेट बंद करने से लाखों लोगों के मौलिक अधिकार प्रभावित होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने फैसले में यही संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया। अदालत के अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके नाम पर नागरिकों के अधिकारों पर अनिश्चितकाल या जरूरत से ज्यादा प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। हर इंटरनेट शटडाउन को कानून, आवश्यकता, पारदर्शिता और अनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरना होगा।











