छिंदवाड़ा: दुर्गा मंदिर में महाष्टमी पर पंचकुण्डीय हवन, 1200 साल पुरानी चमत्कारी प्रतिमा

छिंदवाड़ा। स्वामी सदानंद तीर्थ ने बताया कि आज 19 अक्टूबर को महानवमी के अवसर पर मंदिर परिसर में कन्या पूजन और कन्या भोज, भंडारा और शाम को कलश विसर्जन के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने श्रद्धालुओं से धार्मिक आयोजनों में शामिल होकर मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करने का आह्वान किया। श्रद्धालुओं ने विधिवत आहुतियां अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि, सुख-शांति और लोककल्याण की कामना की। हवन के समापन पर आरती की गई और श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया।
आस्था के साथ प्राचीन इतिहास भी समेटे हुए है मंदिर
छिंदवाड़ा का यह दुर्गा मंदिर केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका इतिहास स्थानीय मान्यताओं, जनश्रुतियों, प्राचीन प्रतिमाओं और साधना परंपरा से भी जुड़ा हुआ है। स्वामी शिवोम् तीर्थ कुण्डलिनी महायोग आश्रम दुर्गा मंदिर ट्रस्ट के नाम से प्रसिद्ध यह स्थान वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन समय में यहां खुले आसमान के नीचे आम के पेड़ के पास शिलाओं के रूप में देवी का स्थान स्थापित था। धीरे-धीरे यहां पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा विकसित हुई। इस स्थान से पिंडारियों की पूजा-अर्चना, पुराने समय की सैनिक छावनियों और सतपुड़ा छोटी रेल लाइन के शुरुआती दौर से जुड़ी कई जनश्रुतियां भी प्रचलित हैं। स्वतंत्रता के बाद मंदिर में नियमित पूजा-अर्चना दोबारा शुरू होने से जुड़ा प्रसंग भी सुनाया जाता है। स्थानीय विवरण के अनुसार, तत्कालीन कलेक्टर मथुरा प्रसाद द्विवेदी के कार्यकाल में इस स्थान की साफ-सफाई कराकर पूजा-पाठ की परंपरा को पुनः व्यवस्थित करने की पहल की गई थी।
मां दुर्गा की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा और आश्रम का विकास
स्थानीय इतिहास के अनुसार, वर्ष 1960 के दशक में यहां मां दुर्गा की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा कराई गई थी। बाद में प्रतिमा खंडित होने पर दुर्गा महिला मंडल के माध्यम से नई प्रतिमा स्थापित करने की व्यवस्था की गई। कलेक्टर श्रीमती बनर्जी द्वारा गठित महिला मंडल में प्रत्येक सोमवार और एकादशी को श्रीरामचरितमानस का पाठ किया जाता था। इससे प्राप्त दानराशि का उपयोग धार्मिक कार्यों में किया गया। इसके बाद स्वामी शिवोम् तीर्थ महाराज के सान्निध्य में मंदिर और आश्रम का विकास हुआ। स्थानीय विवरण के मुताबिक, तत्कालीन कलेक्टर नर्मदा प्रसाद तिवारी के कार्यकाल में यहां कवेलू की छत वाला मंदिर और दीक्षा, साधना एवं पूजन के लिए पक्का कमरा बनवाया गया। इसी दौर में यह स्थान आश्रम के स्वरूप में विकसित होने लगा। बाद के वर्षों में मंदिर एवं आश्रम का नवीनीकरण कराया गया। वर्ष 2013 में बसंत पंचमी के अवसर पर रामदरबार की प्राण-प्रतिष्ठा के साथ स्वामी विष्णु तीर्थ, स्वामी शिवोम् तीर्थ और भास्करानंद तीर्थ महाराज की प्रतिमाएं स्थापित कर गुरु त्रिमूर्ति को प्रतिष्ठित किया गया।.
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1200 वर्ष पुरानी बताई जाती है मां सिद्धिदात्री की प्रतिमा
मंदिर की प्रमुख विशेषताओं में मां सिद्धिदात्री की प्राचीन प्रतिमा भी शामिल है। स्थानीय विवरण के अनुसार, यह प्रतिमा पहले एक लोहार के यहां बाउंड्री वॉल में गड़ी हुई थी। बाद में इसे प्राचीन प्रतिमा मानते हुए मालखाने में रखवाए जाने की बात कही जाती है। मान्यता के अनुसार, स्वामी शिवोम् तीर्थ महाराज के सान्निध्य में इस प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा कराई गई। स्थानीय जानकारी में वर्ष 2007 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारियों द्वारा प्रतिमा का कार्बन डेटिंग परीक्षण किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसी आधार पर प्रतिमा को लगभग 1200 वर्ष पुराना बताया जाता है। हालांकि, इसकी आयु और परीक्षण से संबंधित दावे की स्वतंत्र पुरातात्विक पुष्टि उपलब्ध होने पर ही इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य माना जा सकता है।
भरतादेव और गुदड़देव की लोककथा भी प्रचलित
इस स्थान से भरतादेव और गुदड़देव नामक दो शिल्पकार भाइयों की लोककथा भी जुड़ी है। कथा के अनुसार, दोनों भाई एक गुफा में मूर्तियां बनाया करते थे। उनकी बहन प्रतिदिन भोजन लेकर आती थी और गुफा के बाहर घंटी बजाती थी। एक दिन वह बिना घंटी बजाए भीतर चली गई। इसके बाद दोनों भाइयों के वहां से चले जाने और शिलाओं में परिवर्तित होने की कथा प्रचलित हुई। स्थानीय लोकमान्यता में इस घटना को भरतादेव और गुदड़देव नाम से जुड़े स्थान की पहचान से जोड़ा जाता है।
मंदिर परिसर में स्थापित हैं कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएं
वर्तमान में मंदिर एवं आश्रम परिसर में मां दुर्गा, मां सिद्धिदात्री, शिवलिंग, भगवान शंकर, गणेश परिवार, लड्डू गोपाल, नागदेव, हनुमान जी, रामदरबार, भैरव जी, नवग्रह मंदिर, नवग्रह वाटिका और गुरु दरबार में गुरु त्रिमूर्ति स्थापित हैं। यह स्थान पूजा-अर्चना, साधना, दीक्षा और गुरु परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।




















