रियल एस्टेट मार्केट में अभी प्रीमियम और अपर-मिड सेगमेंट की मांग लगातार बनी हुई है। इस श्रेणी के खरीदार आमतौर पर बैंक लोन पर कम निर्भर होते हैं और ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव से ज्यादा प्रभावित भी नहीं होते। मार्डन सुविधाएं, बेहतर लोकेशन, बढ़िया लाइफस्टाइल अपग्रेडेशन उनकी प्रायोरिटी है। यहां तक रियल एस्टेट वलपर्स भी अब कम फ्लैट बेचकर भी ज्यादा कमाई की रणनीति पर काम करने में इच्छुक हैं।
कोरोना के बाद से सस्ते और मिड-सेगमेंट घरों की बिक्री में तेजी से गिरावट देखी जा रही है। महंगाई, बढ़ती ब्याज दरें और निर्माण लागत में उछाल ने इस श्रेणी के लोगों को खरीदारी पर एक तरह से रोक लगा दी है। ऐसा पहली बार देखा जा रहा है कि घर खरीदने वाले लोग अब बजट को लेकर ज्यादा सतर्क हैं और खरीद का फैसला टालने में लगे हैं। हालांकि किराए में लगातार बढ़ोतरी से यह साफ है कि, अफोर्डेबल हाउसिंग की जरूरत खत्म नहीं हुई है। अर्फोडेबल घर की जरूरतें और मांग अभी भी हैं लेकिन उस तरीके के सप्लाई में लगातार कमी आई है।
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रियल डेवलपर्स का कहना है कि,जमीन की कीमतें महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक तेजी से बढ़ी हैं। साथ ही, कंस्ट्रक्शन मैटेरियल की लागत पिछले तीन साल में करीब 60 फीसदी तक बढ़ चुकी है। ऐसे में कम कीमत वाले मकान बनाना वाकई एक चुनौति का काम है। सरकार ने अफोर्डेबल हाउसिंग की परिभाषा तय तो कर दी है, लेकिन जमीन और लागत पर कोई राहत नहीं मिल रही, जिस वजह से प्राइवेट डेवलपर्स के लिए इस सेगमेंट में नए प्रोजेक्ट लॉन्च करना परेशानी का कारण बनता जा रहा है।
रियल एस्टेट से जुड़े विशेषज्ञ कहते हैं कि जब तक आम खरीदारों का बाजार में मार्केट नहीं बढ़ता तब तक रियल एस्टेट की असल ग्रोथ पूरी हो ही नहीं सकती। अगर सरकार चाहे तो रियायती दरों पर जमीन उपलब्ध कराकर या अफोर्डेबल हाउसिंग की परिभाषा में बदलाव लाकर, इस सेंगमेंट के लोगों की चाह फिर से पूरी कर सकती है।