
प्रीति जैन- हम सभी इस कहावत से परिचित हैं कि लेने से बेहतर है देना। कई शोधों में यह साबित हुआ है कि हममें से जो दयालु और करुणामय हैं, वे अपने स्वास्थ्य और खुशी को साफतौर पर अनुभव करते हैं। दयालुता तनाव को कम करने और हमारे भावनात्मक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में भी मदद करती है। यही वजह है कि 13 नवंबर को दुनिया भर में वर्ल्ड काइंडनेस डे के रूप में सेलिब्रेट किया जाता है ताकि हर वर्ग में दयालुता की भावना को बढ़ावा दे सकें।
दयालुता का सीधा संबंध आर्थिक संपन्नता से नहीं है न ही यह सक्षम वर्ग के लिए है, बल्कि जिसके पास कुछ भी न हो वो सिर्फ अपने भाव व मुस्कुराहट के साथ दयालुता दिखा सकते हैं। हम सभी के जीवन में बहुत कुछ चल रहा है, जिसमें प्रतिस्पर्धा और तनाव कभी- कभी दयालुता को एक तरफ धकेल देते हैं। किसी के प्रति दयालुता प्रकट करना किसी फायदे के लिए नहीं होना चाहिए वरना यह स्वार्थ कहलाएगा।
दयालु बनेंगे तो भीतर से खुश और हल्का महसूस करेंगे
दुनिया में जो कुछ भी चल रहा है, उसके साथ अब एक दयालु समाज बनाने में मदद करने का समय है जो हमारे मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है। दयालुता कुछ ऐसा करने का चुनाव करना है जो दूसरों या खुद की मदद करें, जो वास्तविक गर्मजोशी भरी भावनाओं से प्रेरित हो। दयालुता, या अच्छा करने का मतलब अक्सर दूसरों की जरूरतों को अपनी जरूरतों से पहले रखना होता है। यह किसी ऐसे व्यक्ति को बस में अपनी सीट देना हो सकता है जिसे इसकी ज्यादा जरूरत हो, या घर पर काम करने किसी हेल्पर के लिए एक कप चाय बनाने की पेशकश करना हो सकता है। यह तनाव को कम करने के साथ-साथ मूड, आत्मस म्मान और खुशी में भी सुधार कर सकता है। हमारे रोजमर्रा के जीवन में दूसरों की मदद करने के कई तरीके हैं। अच्छे कामों के लिए ज्यादा समय या पैसे खर्च करने की जरूरत नहीं होती। -डॉ. शिखा रस्तोगी, मनोविशेषज्ञ
ऑनलाइन पोस्ट करते समय दयालुता दिखाना आसान हो सकता है, लेकिन जब वास्तविकता की बात आती है तो अपने कार्यों में दयालुता दिखाना कठिन होता है। दूसरों के प्रति दयालु होने के लिए समय निकालकर, हम भावनात्मक रूप से सकारात्मक पहलुओं से लाभ उठा सकते हैं। खासतौर उन लोगों के लिए जो कमजोर हैं या संघर्ष कर रहे हैं। जिस तरह हम साल भर त्योहारों के मौके पर बच्चों व महिलाओं के साथ काम करके उन्हें इस स्थिति में लाते हैं कि वे अपना जीवन ठीक तरह चला सकें और त्योहार अच्छे से मना सकें। -रेखा शर्मा, सोशल वर्कर
दिवाली से चार दिन पहले से महात्मा गांधी विद्यालय, भेल के स्टूडेंट्स के साथ दिव्यांग लोगों की मदद के लिए उनकी सामग्री बिक्री कराने में मदद की। हाथ में कागज की तख्ती लिए स्टूडेंट्स दीयों वालों के पीछे खड़े थे और आने जाने वालों से निवेदन कर रहे थे कि वह इनसे दीया खरीदें ताकि उनकी मदद हो सके। विद्यार्थियों को दयालुता किताबों से नहीं बल्कि ऐसे भावों को प्रकट कराकर सिखाई जाना चाहिए जिसे वे खुद महसूस कर सकें और आगे इसका महत्व समझें। -डॉ. अर्चना शुक्ला, टीचर