
धागा और समकालीन शैली में गणपत सखाराम मसगे एवं साथियों ने मिलकर लंकादहन की प्रस्तुति कठपुतलियों के माध्यम से दिखाई। जनजातीय संग्रहालय में चल रहे पुतुल समारोह में हर दिन नई प्रस्तुतियां दीं जा रहीं हैं। सुंदर और सुगठित पुतुल को देखकर दर्शक उनकी प्रशंसा किए बिना नहीं रह पाएं। चटक रंग की राजसी पोशाकों व पुतुल के चटक रंगों में श्रीराम, राजा दशरथ, गणेशजी, सीता, लंकापति सभी दिखाई दिए। सिंधुदुर्ग संस्था द्वारा लंकादहन की प्रस्तुति का संयोजन किया गया। इस मौके पर कलाकारों द्वारा प्रस्तुति की शुरुआत गणेश वंदना से की गई। भारत में पारंपरिक पुतली नाटकों की कथावस्तु पौराणिक साहित्य, दंत कथाओं और किंवदंतियों से ली जाती रही है। यह विधा विदेशों में भी प्रचलित है।
16 और 17 को होंगी यह प्रस्तुतियां
समारोह के चौथे दिन 16 सितंबर को दस्ताना, छड़, धागा शैली में विभाष उपाध्याय एवं साथी, भिलाई द्वारा चरणदास चोर और पण्डवानी, 17 सितंबर को धागा, छड़ और छाया शैली में बिनिता देवी एवं साथी, गुवाहाटी रावण वध एवं तेजीमल कथा की प्रस्तुति दी जाएगी। कार्यक्रम में प्रवेश नि:शुल्क है।
जाने धागा पुतली के बारे में
भारत में धागा पुतलियों की परंपरा अत्यंत प्राचीन तो है ही साथ ही समृद्ध भी है। कई जोड़ युक्त अंग तथा धागों द्वारा संचालन इन्हें अत्यंत लचीलापन प्रदान करता है, जिस कारण ये पुतलियां काफी लचीली होती है। राजस्थान, ओडिशा, कर्नाटक और तमिलनाडु ऐसे प्रांत हैं जहां यह पुतली कला पल्लवित हुई ।