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भोपाल की युवतियों की अनूठी दोस्ती; शब्द नहीं, इशारों से समझती हैं एक-दूसरे की भावनाए

27 साल से है युवतियों की मित्रता, एक-दूसरे की मदद से घर बसाया, अब कर रहीं अन्य दिव्यांग बच्चों की मदद

प्रवीण श्रीवास्तव-भोपाल। कहते हैं दोस्ती की कोई भाषा नहीं होती.. इसका आधार सिर्फ प्यार और अहसास है। दोस्त वही है जो बिना बोले, सुने दोस्त के दिल का हाल समझ ले। रविवार को फ्रेंडशिप डे है। हम आपको चार ऐसे दोस्त (प्रीति, चिंकी, निवेदिता और मोहिनी) से मिला रहे हैं, जिनकी दोस्ती किसी शब्द या भाषा की मोहताज नहीं है। दरअसल, चारों दोस्त बधिर हैं लेकिन पिछले 27 सालों से एक दूसरे के साथ हैं। प्रीति बोल और सुन नहीं सकती, लेकिन हाथ के इशारों से उन्होंने हमें दोस्ती की दास्तान सुनाई।

हम उनके इशारों को समझ नहीं सके तो उनके साथी प्रदीप लूथरा ने मदद की। प्रदीप साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट हैं। प्रीति ने बताया कि वे इंदौर की रहने वाली हैं। उनके माता-पिता भी पैदाइशी बधिर हैं। पिता एक कंपनी में टेलर थे और मां दूसरों के घरों में खाना बनाती थीं। स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही उनकी मुलाकात पहले चिंकी से हुई और बाद में निवेदिता और मोहिनी भी मिलीं। स्कूल के दौरान हुई दोस्ती आज भी कायम है।

हर तरह से करती हैं एक-दूसरे की मदद

प्रीति बताती हैं कि हम चारों दोस्त अच्छे और बुरे समय में साथ रहते हैं। जब मेरी शादी हुई तो मेरा परिवार पति के लिए उपहार नहीं खरीद सका। ऐसे में चिंकी, निवेदिता और मोहिनी ने काम कर और अपना सोना बेचकर मेरे लिए एक दुपहिया गाड़ी और अन्य सामान खरीदा। चिंकी की शादी में हम तीनों ने मिलकर एक स्कूटर खरीदा। वहीं, निवेदिता को शादी के बाद बाहर घूमने भेजा और मोहिनी के लिए हीरों की कान की बालियां खरीदीं। इसके लिए हमें लोन भी लेना पड़ा जो हम सब मिलकर चुकाते हैं।

अब करते हैं बधिर बच्चों की मदद

मुझे बचपन में ही अहसास हो गया था कि बधिर होने पर लोगों के तानों का जवाब सिर्फ पढ़ाई लिखाई से ही दिया जा सकता है। इसलिए तमाम मुश्किलों के बाद भी मैंने पढ़ाई जारी रखी। इसी सोच के चलते हमने 2011 में डेफकैन फाउंडेशन की शुरुआत की। इस फाउंडेशन के माध्यम से हम बधिर बच्चों को इंग्लिश स्पोकन की साइन लैंग्वेज के साथ अन्य विधाओं में ट्रेंड करते हैं। हम सिर्फ भोपाल ही नहीं, देश-विदेश में बच्चों को ट्रेंड करते हैं, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ा हो सकें।

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