दोषमुक्ति के बाद भी पुलिस विभाग ने नहीं दी नौकरी, हाईकोर्ट ने कांस्टेबल की बहाली के दिए आदेश

इंदौर। आपराधिक मामले में दोषमुक्त होने के बावजूद सेवा में बहाली के लिए भटक रहे आरक्षक निरंजन को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ से राहत मिली है। जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की एकलपीठ ने उसकी बर्खास्तगी सहित विभागीय अपील और बहाली का आवेदन खारिज करने के आदेश निरस्त कर दिए। कोर्ट ने आरक्षक को तत्काल सेवा में बहाल करने के निर्देश दिए। साथ ही स्पष्ट किया कि दोषमुक्ति के खिलाफ आपराधिक पुनरीक्षण याचिका लंबित होने मात्र से बहाली नहीं रोकी जा सकती।
2016 में केस, 2022 को हुआ था बर्खास्त
निरंजन के खिलाफ वर्ष 2016 में देवास जिले के टोंकखुर्द थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के तहत मामला दर्ज हुआ था। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने 7 सितंबर 2022 को उसे दोषी ठहराते हुए दो वर्ष के सश्रम कारावास और एक हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके आधार पर पुलिस विभाग ने 5 दिसंबर 2022 को उसे बर्खास्त कर दिया। विभागीय अपील भी 3 जनवरी 2023 को खारिज कर दी गई।
विभाग आरोप साबित करने में विफल
निरंजन ने दोषसिद्धि को सत्र न्यायालय में चुनौती दी। अपीलीय अदालत ने 16 मई 2023 को उसे दोषमुक्त करते हुए माना कि अभियोजन आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा और निचली अदालत ने साक्ष्यों का सही आकलन नहीं किया। इसके बावजूद विभाग ने हाई कोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका लंबित होने का हवाला देकर 3 जुलाई 2025 को बहाली का आवेदन खारिज कर दिया था।
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तीन महीने में देना होगा बकाया
हाई कोर्ट ने बर्खास्तगी और संबंधित आदेश निरस्त करते हुए निर्देश दिया कि 7 सितंबर 2022 से 16 मई 2023 तक का पिछला वेतन नहीं मिलेगा। वहीं, 22 मई 2023 को दोषमुक्ति का फैसला विभाग को सौंपने के बाद की अवधि के लिए 50 प्रतिशत पिछला वेतन दिया जाएगा। इसकी बकाया राशि बहाली की तारीख से तीन महीने के भीतर चुकानी होगी। वेतन को छोड़कर अन्य सभी सेवा संबंधी प्रयोजनों के लिए सेवा निरंतर मानी जाएगी।
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