
नई दिल्ली। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के हक में ऐतिहासिक फैसला दिया है। 26 साल पुराने एक केस पर सुनवाई करते हुए शीर्ष कोर्ट ने कहा कि शादी के आधार पर किसी को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। मामला आर्मी में पदस्थ एक नर्सिंग ऑफिसर का है, जिसे शादी करने के बाद बर्खास्त कर दिया गया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा कि इस तरह का नियम मनमाना था। महिला की शादी हो जाने की वजह से उसे नौकरी से निकालना लैंगिक भेदभाव और असमानता है।
60 लाख रुपए का मुआवजा मिलेगा
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की युगलपीठ ने केंद्र सरकार को शादी के बाद सेवा से बर्खास्त की गईं नर्सिंग ऑफिसर को 60 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह मामला 26 साल पुराना है। 1998 में सेलिना जॉन को आर्मी नर्सिंग सर्विस के लिए चुना गया था और वह दिल्ली के आर्मी अस्पताल में बतौर ट्रेनी शामिल हुई थीं। उन्हें मिलिट्री नर्सिंग सर्विसेज (MNS) में लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशन दिया गया था। इस दौरान उन्होंने आर्मी के ही ऑफिसर मेजर विनोद राघवन के साथ शादी कर ली। विवाह के बाद सेलिना को लेफ्टिनेंट के पद से रिलीज कर दिया गया। सेलिना को नौकरी से रिलीज करने के दौरान कोई कारण बताओ नोटिस, सुनवाई या अपने बचाव में बात रखने मौका भी नहीं दिया गया था।
केंद्र ने की थी सुप्रीम कोर्ट में अपील
केंद्र सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि ये फैसला उस समय लागू MNS में परमानेंट कमीशन देने के नियम और शर्तों के तहत लिया गया था। इसमें प्रावधान था कि MNS में मेडिकल बोर्ड की राय में अनफिट होने, शादी करने और गलत व्यवहार पर नौकरी से निकाला जा सकता है। शादी का यह नियम सिर्फ महिलाओं पर ही लागू होता था। इससे पहले मार्च 2016 में यह मामला सशस्त्र बल न्यायाधिकरण, लखनऊ में गया। जिसने आर्मी नर्सिंग सर्विस के आदेश को रद्द करते हुए सेलिना को बकाया वेतन और अन्य लाभ भी देने के आदेश दिए थे। ट्रिब्यूनल ने सेलिना की सेवा बहाली की भी इजाजत दी थी। इस निर्णय के खिलाफ कोर्ट ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था।