
प्रीति जैन- अगर आपका बच्चा आंखों को तिरछा यानी स्क्विंट करके देख रहा है…, जोर-जोर से और बार-बार आंख रगड़ता है…, पढ़ते या टीवी देखते वक्त सिर एक तरफ झुका लेता है और स्कूल नोटबुक में अधिकांश बार गलतियां कर रहा है तो फिर आपको सचेत होने की जरूरत है। ऐसे कई लक्षण हैं, जिनसे बच्चों में मायोपिया की आशंका हो सकती है, जिसके लिए आई स्पेशलिस्ट से जरूर कंसल्ट करें, क्योंकि लगातार बढ़ते स्क्रीन टाइम, अनुवांशिक बीमारियों, चोट आदि के कारण आंखों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है।
पैरेंट्स अक्सर अपने बच्चों को मोबाइल, लैपटॉप व टीवी से दूरी बनाने को कहते नजर आते हैं, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। अब वक्त आ गया है कि बच्चों को इसके खतरों से अवगत कराकर जागरूक किया जाए, यही वजह है कि इस साल वर्ल्ड साइट डे की थीम ‘चिल्ड्रन, लव योअर आईज’ रखी गई है। अब डॉक्टर्स बच्चों को स्कूल्स में भी जाकर समझा रहे हैं कि स्क्रीन टाइम को घटाना होगा।
डब्लूएचओ ने जारी किए टिप्स
वर्ल्ड साइट डे को लेकर डब्लूएचओ ने अपनी वेबसाइट पर एक आर्टिकल जारी किया, जिसमें उन्होंने बताया है कि स्क्रीन टाइम कम करना और बाहर समय बिताना बच्चों को निकट दृष्टि दोष (मायोपिया) से बचाता है। पढ़ने या डिजिटल गैजेट का उपयोग करने के दौरान नियमित रूप से ब्रेक लेना, आंखों को नुकसान पहुंचाने वाले उपकरणों और रसायनों का उपयोग करते समय सुरक्षा रखना जरूरी है। इसमें पैरेंट्स की भूमिका महत्वपूर्ण है।
बच्चे की आंखों की जांच कब कराएं
- बच्चों की आंखों की पहली संपूर्ण जांच 6 माह की आयु में होनी चाहिए।
- उसके बाद तीन वर्ष की आयु में और स्कूल जाना शुरू करने से पहले लगभग 5 से 6 वर्ष की आयु में होनी चाहिए।
- बच्चों का साल में कम से कम एक बार आई टेस्ट जरूर कराएं।
- टीवी, कंप्यूटर या मोबाइल की स्क्रीन को बहुत पास से देखता हो।
- किताबों को अपनी आंखों के बहुत पास लाकर पढ़ता हो।
- लगातार कई दिनों से आंखों और सिर में दर्द की शिकायत कर रहा हो।
- बार-बार या सामान्य से अधिक पलकें झपकाने की समस्या हो।
कंसल्टेशन के दौरान बच्चों को समझाती हूं
हमारे पास पांच साल के बच्चे भी आई टेस्ट के लिए आते हैं और हैरानी होती है कई बार वो चक्कर आने जैसे लक्षण भी बताते हैं। मैं बच्चों को कंसल्टेशन के दौरान या स्कूल्स में जाकर समझाती हूं कि 75 फीसदी सीखने की क्षमता देखने से आती है। डिजिटल गैडेट्स को नजदीक देखने के कारण आंखों की मांसपेशियों पर जोर पड़ता है, जिससे चश्मे का नंबर तेजी से बढ़ता है। बच्चे पैरेंट्स की नहीं मानते तो अब मैं बच्चों को प्यार से तो कभी थोड़ा डांटकर समझाती हूं। – डॉ. विनीता रामनानी, आई स्पेशलिस्ट
बच्चों को समझाता हूं इससे आंखों की बीमारियां बढ़ेगीं
हम बच्चों को यही समझाते हैं कि यदि आंखें कमजोर होंगी तो उनके सीखने की क्षमता और पर्सनालिटी डेवलपमेंट पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जैसे स्कूल या कॉलेज में प्रदर्शन एवं ग्रेडस गिरने लगती हैं। वहीं, हाई मायोपिया हो तो सबसे पहले मोटे चश्मे के अलावा पर्दे पर खराबी या पर्दे का खिंचना, कांचबिंद एवं मोतियाबिंद होने की अधिक संभावनाएं होती हैं। बच्चों को तर्क के साथ समझाना जरूरी है तो वे कई बार मानते भी हैं। – डॉ. केके अग्रवाल, आई स्पेशलिस्ट