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'जॉनी-जॉनी यस पापा' पर यूपी शिक्षा मंत्री बोले-ऐसी कविताएं बच्चों को झूठ सिखाती हैं; हिंदी कविताओं में संस्कार

उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने कानपुर में कहा कि ‘जॉनी-जॉनी यस पापा’ जैसी इंग्लिश राइम्स बच्चों को भारतीय संस्कार नहीं सिखातीं। उनके बयान पर बहस छिड़ गई है। वहीं, दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर ने कहा कि यह कविता बच्चों को जवाबदेही सिखाती है।
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ऐसी कविताएं बच्चों को झूठ सिखाती हैं; हिंदी कविताओं में संस्कार

उत्तर प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय का एक बयान इन दिनों खूब चर्चा में है। कानपुर के एक कार्यक्रम में उन्होंने बच्चों की फेमस इंग्लिश राइम 'जॉनी-जॉनी यस पापा' पर सवाल उठाए। मंत्री ने कहा कि ऐसी अंग्रेजी कविताएं बच्चों को भारतीय संस्कार और अच्छे जीवन मूल्य नहीं सिखातीं, बल्कि झूठ बोलने जैसी बातें सिखाती हैं। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया और शिक्षा जगत में बहस शुरू हो गई। कुछ लोग मंत्री की बात से सहमत नजर आए, जबकि कई शिक्षकों और प्रोफेसरों ने कहा कि बच्चों की हर कविता को नैतिकता के नजरिए से देखना सही नहीं है।

कानपुर के कार्यक्रम में दिया बयान

योगेंद्र उपाध्याय 5 मई को कानपुर में आयोजित शिक्षामित्र सम्मान समारोह में पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने शिक्षा, संस्कार और बच्चों की शुरुआती पढ़ाई पर अपनी राय रखी। मंत्री ने कहा कि आज बच्चों को जो कविताएं पढ़ाई जा रही हैं, उनमें भारतीय सोच और समाज की भावना कम दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि 'जॉनी-जॉनी यस पापा' जैसी कविताओं में बच्चा झूठ बोलता है और फिर पकड़ा जाता है। मंत्री के मुताबिक इस तरह की कविताएं बच्चों को सही दिशा देने के बजाय गलत संदेश भी दे सकती हैं। योगेंद्र उपाध्याय ने कहा कि हमारी पुरानी हिंदी कविताएं बच्चों को संस्कार, नैतिकता और समाज के लिए सोचने की सीख देती थीं। आज की कई विदेशी कविताओं में वो बात नहीं दिखाई देती।

'रेन रेन गो अवे' का भी दिया उदाहरण

अपने भाषण के दौरान मंत्री ने दूसरी इंग्लिश राइम ‘रेन रेन गो अवे, माय जॉनी वॉन्ट्स टू प्ले’ का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस कविता में सिर्फ अपने सुख की बात होती है, जबकि भारतीय संस्कृति हमेशा सबके हित की सोच सिखाती है। उन्होंने कहा किहमारी परंपरा 'बहुजन हिताय' की बात करती है। यहां केवल खुद के आनंद के लिए दूसरों की जरूरतों को नजरअंदाज करना सही नहीं माना जाता। मंत्री ने दावा किया कि पुरानी हिंदी कविताओं और कहानियों में जीवन के गहरे मूल्य छिपे होते थे, जिनसे बच्चों का चरित्र निर्माण होता था।

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बयान पर शुरू हुई बहस

योगेंद्र उपाध्याय के इस बयान के बाद शिक्षा जगत में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं। कई लोगों ने कहा कि बच्चों की कविताओं को केवल नैतिकता के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग की एक प्रोफेसर ने मंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि हर कविता या कहानी का मकसद केवल नैतिक शिक्षा देना नहीं होता। कुछ कविताएं बच्चों के मनोरंजन, भाषा विकास और कल्पनाशक्ति बढ़ाने के लिए भी होती हैं। उन्होंने कहा कि जॉनी-जॉनी यस पापा एक साधारण बातचीत पर आधारित कविता है। इसमें बच्चा झूठ बोलता है और बाद में सच सामने आ जाता है। इसे जवाबदेही यानी अकाउंटेबिलिटी के तौर पर भी देखा जा सकता है। प्रोफेसर ने आगे कहा कि बच्चों के मानसिक विकास में हल्की-फुल्की और मजेदार कविताओं की भी अहम भूमिका होती है।

'यशोदा-कृष्ण' की कहानी से की तुलना

दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर ने इस पूरे विवाद को भारतीय पौराणिक संदर्भ से भी जोड़कर समझाया। उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण और माता यशोदा के बीच माखन खाने को लेकर होने वाली बातचीत भी कुछ हद तक ऐसी ही है। उन्होंने कहा कि जब कृष्ण माखन खाने से इनकार करते हैं और बाद में सच सामने आता है, तो उसे हम प्यार और बाल सुलभ शरारत के रूप में देखते हैं। ठीक उसी तरह बच्चों की कविताओं को भी हल्के अंदाज में समझना चाहिए। उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों ने अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देना शुरू कर दिया।

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CBSE के प्री-स्कूल सिलेबस में शामिल है राइम

बच्चों की पॉपुलर इंग्लिश राइम 'जॉनी जॉनी यस पापा' CBSE के नर्सरी और प्री-स्कूल सिलेबस का हिस्सा है। कई जगह बच्चों को ये सिलेबस के इतर भी पढ़ाया जाता है। हालांकि ये राइम NCERT सिलेबस का हिस्सा नहीं है।

शिक्षामित्रों के मानदेय बढ़ाने का भी ऐलान

कार्यक्रम के दौरान योगेंद्र उपाध्याय ने शिक्षामित्रों को लेकर भी बड़ा ऐलान किया। उन्होंने बताया कि सरकार ने शिक्षामित्रों का मानदेय 10 हजार रुपये से बढ़ाकर 18 हजार रुपये कर दिया है। मंत्री ने 12 शिक्षामित्रों को प्रतीकात्मक चेक भी सौंपे। उन्होंने कहा कि इस फैसले से खासकर गांव और दूरदराज इलाकों में काम कर रहे शिक्षामित्रों को राहत मिलेगी। योगेंद्र उपाध्याय ने अपने संबोधन में कहा कि शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। बच्चों को पढ़ाई के साथ संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी की सीख देना भी जरूरी है।

Sona Rajput
By Sona Rajput

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन किया है। साल 2022 ...Read More

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