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ब्रेन रोट से गिर रहा बौद्धिक स्तर, हल्के स्तर के कंटेंट से बनाएं दूरी

ऑक्सफोर्ड वर्ड ऑफ द ईयर बना ब्रेन रोट, लो क्वालिटी कंटेंट में बर्बाद न करें वक्त

प्रीति जैन- ब्रेन रोट जिसे शोधकर्ता मेंटल फॉगिनेस भी कहते हैं, जो कि इन दिनों चर्चा में है, क्योंकि यह ऑक्सफोर्ड वर्ड ऑफ द ईयर बना है। जेनरेशन-जेड के लिए ही नहीं, बल्कि यह स्थिति ऑनलाइन रहने वाले उन सभी लोगों की है जिनकी सुबह की शुरुआत आंख खुलने के साथ ही स्क्रीन पर स्क्रॉलिंग से शुरू होती है। एक ही तरह का ऑनलाइन कंटेंट कंज्यूम करते-करते मेंटल फटीग होने लगती है। इससे चिड़चिड़ापन महसूस होता है। गैरजरूरी व घंटों की स्क्रॉलिंग के बाद किसी काम में मन नहीं लगता क्योंकि मानसिक रूप से व्यक्ति कुछ प्रोडक्टिव काम करने से पहले ही थका हुआ महसूस करने लगता है।

अपने इंटेलेक्ट लेवल को न गिराएं

ब्रेन रोट शब्द को किसी व्यक्ति की मानसिक या बौद्धिक स्थिति में गिरावट के रूप में परिभाषित किया है, विशेष रूप से लो लेवल ऑनलाइन कंटेंट के अत्यधिक उपभोग के कारण होने वाली गिरावट। हल्के स्तर की जानकारी मेंटल हेल्थ पर बुरा असर डालती है।

बौद्धिक स्तर बनाए रखें, 80:20 का कंटेंट प्रैक्टिस करें

बौद्धिक स्तर के पोषित करना जरूरी होता है इसलिए 80 फीसदी कंटेंट मीनिंगफुल होना चाहिए फिर भले ही 20 फीसदी लाइट मूड कंटेंट देखें। इसके अलावा ऐप के जरिए अपनी सोशल मीडिया लाइफ पर नजर रखें कि किस ऐप पर कितना वक्त बिताया है। सुबह के समय न्यूजपेपर पढ़ने की आदत डालें बजाए सीधे फोन उठाने के। स्क्रॉलिंग पर समय बिताने की बजाए क्रिएटिव कामों में मन लगाएं। – डॉ. शिखा रस्तोगी, मनोविशेषज्ञ

बच्चों में ब्रेन रोट के कारण ध्यान केंद्रित में दिक्कत

बच्चों में ब्रेन रोट के कारण अक्सर ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, एकाग्रता में कमी और शैक्षणिक प्रदर्शन में गिरावट की समस्या हो सकती है। दूसरी ओर, वयस्कों में ये भूलने की बीमारी, चिड़चिड़ापन और खुश होने के लिए उपकरणों पर अत्यधिक निर्भरता की दिक्कत पैदा कर सकता है। समय के साथ ब्रेन रोट के कारण मानसिक स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों में बढ़ोतरी हुई है। निरंतर लो लेवल के कंटेंट देखना मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। इसकी वजह से हमारा मस्तिष्क नए विचार उत्पन्न करने के बजाय बाहर की जानकारी को अवशोषित करने का अधिक आदी हो जाता है। ये मस्तिष्क की स्वाभाविक प्रक्रिया को भी बाधित करने वाला हो सकता है, जिस वजह से दीर्घकालिक रूप में गंभीर परिणाम हो सकते हैं। -डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी, मनोचिकित्सक

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