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मेरी ‘मूंछें’ लोगों को असामान्य लगती होंगी, लेकिन मुझे बहुत ‘अच्छी’

पुष्पेन्द्र सिंह-भोपाल। मध्यप्रदेश कॉडर के वर्ष 1988 बैच के आईएफएस असीम श्रीवास्तव वर्तमान में वन महकमा के प्रमुख यानि ‘वन बल प्रमुख’ के पद पर हैं। इनके जीवन में कई उतार- चढ़ाव आए। बचपन में अपने डॉक्टर पिता को खो दिया। लिहाजा पढ़ाई के लिए कभी उज्जैन, कभी नागपुर तो कभी बालाघाट के स्कूल और कॉलेजों में प्रवेश लेना पड़ा। इन्होंने कॉन्वेंट स्कूल के ‘चेयर डेस्क’ पर बैठकर ABCD पढ़ी तो प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा ‘टाट-फट्टी’ पर बैठकर ली।

कॉलेज लाइफ बहुत ही साधारण रही। उस समय गर्ल फ्रेंड बनाना बड़ा मुश्किल था, लिहाजा युवा मन को ही समझा लेते थे, लेकिन, आज उनकी शान, उनकी ‘मूंछों’ से साफ दिखती है। कपड़े पहनने आदि का कोई विशेष शौक नहीं है। पत्नी को प्रसन्न रखने में ज्यादा विश्वास है। प्रस्तुत है-पीपुल्स समाचार के साथ में हैड ऑफ द फॉरेस्ट (हॉफ) से बातचीत के प्रमुख अंश:-

कक्षा 10वीं में आया जीवन का टर्निंग पॉइंट

  • आपका बचपन कैसे बीता?
  • जवाब: मेरे पिता उज्जैन में एमबीबीएस डॉक्टर थे। उन्हें हमने होश संभालने के पहले ही खो दिया था। स्कूल में पहला कदम उज्जैन में रखा। अंग्रेजी का पहला पाठ सीख पाते कि नागपुर आकर कॉन्वेट स्कूल में एडमिशन हुआ। यहां से अपने ननिहाल बालाघाट आ गए और आगे की पूरी पढ़ाई की।
  • कॉन्वेट और सरकारी स्कूल की पढ़ाई में क्या अंतर पाया?
  • जवाब: कॉन्वेट स्कूल में हम ‘चेयर डेस्क’ पर बैठकर पढ़ाई करते थे। पर, बालाघाट में सरकारी स्कूल की ‘टाट-फट्टी’ पर बैठना पड़ा।
  • स्कूली जीवन की ऐसी घटना जिसने आपको झकझोर दिया हो।
  • जवाब: स्कूल के सामने एक रेहड़ी की दुकान थी। हम दोस्तों के साथ गए और दुकानदार की नजरों से बचाकर चोरी से ‘गुढ़ पट्टी’ उठाकर खा ली। लेकिन, दुकानदार ने पकड़ लिया और गाल पर ऐसा थप्पड़ जड़ा कि उसकी गूंज आज भी याद है। वह थप्पड़ मेरे लिए बड़ी सीख साबित हुई। आज तक चोरी नहीं की। स्कूली जीवन में ही आम के बगीचे में जाकर चोरी से आम तोड़ लिया था, तब चौकीदार ने पकड़ लिया था। इसके बाद तय कर लिया कि बिना पूछे ऐसा कोई काम नहीं करेंगे।
  • पढ़ाई का सफर कैसा रहा?
  • जवाब: बालाघाट में हायर सेकंडरी का एक ही सरकारी स्कूल स्टैण्डर्ड का था। जीवन का टर्निंग पॉइंट कक्षा 10वीं में आया। कक्षा 11वीं में संयुक्त रूप से विद्यालय में प्रथम आया। प्रदेश स्तर पर बनी एक हजार विद्यार्थियों की लिस्ट में मेरा भी नाम आया, पर निचले पायदान पर था। कॉलेज में आया तो बीएससी मैथ में विवि टॉप किया।
  • कॉलेज लाइफ में कोई गर्ल फ्रेंड थी?
  • जवाब: मेरा फ्रेंड सर्किल था, स्मार्ट भी लगता था। लेकिन शर्मिला बहुत था। उस समय लड़कियों से बात करना बड़ा मुश्किल था। लिहाजा कोई गर्ल फ्रेंड नहीं बना पाया।
  • अंतिम सवाल-शादी के बाद पत्नि से नोक-झोंक किस स्तर तक पहुंच जाती है?
  • जवाब: मेरी अरेंज मैरिज हुई थी। समन्वय बहुत अच्छा बनाकर रखा। नोक-झोंक होना तो वैवाहिक जीवन का मुख्य अंग है। समझौता जल्द कर लेता हूं।

‘स्कूल टाइम में चोरी से गुड़ की पट्टी खाई, दुकानदार ने ऐसा थप्पड़ जड़ा कि आज भी वह गूंज याद है, थप्पड़ की गूंज ने मेरी लाइफ ही बदल दी।’

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