
राजीव सोनी-भोपाल। फिल्मी कहानियों में कबूतरों के जरिए प्यार की चिट्ठी और संदेश भेजने के किस्से तो खूब देखने-सुनने में आते हैं, लेकिन यह वाक्या थोड़ा अलग है। 15 साल से दो-ढाई सौ कबूतरों को रोज दाना डालने वाले भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार संजीव जैन अचानक सवा-डेढ़ किमी दूर दूसरे मकान में शिफ्ट हो गए। दाना डलना बंद हो गया, कबूतरों का झुंड कुछ दिन तो पुराने घर के ऊपर मंडराते रहा लेकिन 4 महीने बाद उन्होंने अपने ‘अन्नदाता’ का नया पता ढूंढ ही लिया।
पुराने परिंदों को छत पर देख जैन परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अपने नए घर की छत पर उन्होंने जैसे ही बाजरे की थैली बिखेरी 100 से अधिक कबूतर ‘लंगर’ खाने उतर आए। इसके बाद तो यह सिलसिला फिर चल पड़ा। कबूतरों के झुंड को हर महीने सवा-डेढ़ क्विंटल बाजरा व चावल खिलाकर जैन परिवार को सुकून महसूस होता है। इनकी खुराक पर हर महीने 5-6 हजार रुपए का खर्च उनके परिवार को अनमोल आत्मिक शांति देता है।
पड़ोसियों को भी लुभाने लगी ‘गुटरगूं’ : जैन कहते हैं कि बस यूं ही दाना डालना शुरू किया था। कबूतरों की संख्या बढ़ती गई। मुझे भी इन मेहमानों के आने से अच्छा लगता है। अब तो पड़ोसी भी इनकी गुटरगूं सुनने के आदी हो चुके हैं।
नए पते पर आ धमके
8 साल तक संजीव जैन के शिवाजी नगर वाले घर पर कबूतरों का भंडारा होता था। 2018 में वे चार इमली शिफ्ट हो गए, 4 महीने गैप के बाद सब कुछ फिर वैसा ही हो गया। जैन को जब बाहर जाना पड़ जाए तो उनकी पत्नी सरिता और बच्चे समीर-श्रेयांसी दाना डालते हैं।
कोविड में भी उड़ती रही दावत..
कोविड के दौरान खान-पान और अनाज की दिक्कतें थी तब भी उनकी छत पर कबूतरों का भंडारा नहीं रुका। दुकानदार ने हर हफ्ते बाजरा अथवा मोटे चावल की बोरी घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी स्वयं ही संभाल ली थी।