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Jammu-Kashmir : गणतंत्र दिवस समारोह में सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति का विवाद नहीं है नया, इस वजह से जारी हुआ आदेश

जम्मू। गणतंत्र दिवस नजदीक है, ऐसे में आतंकी अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देने की पूरी कोशिश करेंगे। आतंकी खतरे को देखते हुए सभी जिला मुख्यालयों में तैनात पुलिस अफसरों और अन्य कर्मियों की छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं। साथ ही सरकारी कर्मियों की गणतंत्र दिवस परेड समारोहों में उपस्थिति अनिवार्य कर दी गई है। इसके लिए जारी किया गया सरकारी अध्यादेश कोई नया नहीं है। कश्मीर में आतंकवाद की शुरूआत के साथ ही यह विवाद आरंभ हुआ था जो आज भी जारी है।

सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति क्यों है अनिवार्य?

दहशत और तनाव का परिणाम है कि प्रयासों के बावजूद प्रशासन को नहीं लग रहा है कि गणतंत्र दिवस समारोहों में शामिल होने के लिए अधिक नागरिक आ पाएंगे। परिणामस्वरूप गणतंत्र दिवस समारोहों में अधिक भीड़ को दिखाने के लिए सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के इरादों से एक सरकारी आदेश निकाल सभी सरकारी कर्मचरियों को किसी भी कीमत पर गणतंत्र दिवस समारोहों में उपस्थित होने के लिए कहा गया है।

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अनुपस्थित होने पर होगी कार्रवाई

वैसे ऐसे आदेश को सख्ती से लागू करने का कार्य साल 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद की सरकार के दौरान हुआ था। जिन्होंने तब स्थानीय विधायकों को भी सख्त ताकिद की थी कि अगर उनके इलाके के सरकारी कर्मचारी अनुपस्थित हुए तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।

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मुफ्त सरकारी बसों की व्यवस्था

आजाद के ही मुख्यमंत्रित्व काल में ही आम नागरिकों को गणतंत्र व स्वतंत्रता दिवस सामारोहों की ओर आकर्षित करने के इरादों से मुफ्त सरकारी बसों की व्यवस्था आरंभ हुई थी और अखबारों तथा अन्य संचार माध्यमों में विज्ञापन देकर उनमें जोश भरने की कवायद भी।

1995 में हुए क्रमवार बम विस्फोट

दरअसल कश्मीर में आतंकवाद की शुरूआत के साथ ही 15 अगस्त तथा 26 जनवरी को होने वाले सरकारी समारोह सिर्फ और सिर्फ सुरक्षाबलों के लिए बन कर रह गए थे। क्योंकि आतंकी चेतावनियों और धमकियों के चलते आम नागरिकों के साथ ही सरकारी कर्मियों की मौजूदगी नगण्य ही थी जबकि जो नागरिक इसमें शामिल होने की इच्छा रखते थे, उन्हें लंबे और भयानक सुरक्षा व्यवस्था के दौर से गुजरना पड़ता था।

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वर्ष 1995 में जम्मू के एमए स्टेडियम में तत्कालीन राज्यपाल केवी कृष्णाराव की मौजूदगी में हुए क्रमवार बम विस्फोटों के बाद तो ऐसे समारोहों की ओर नागरिकों का रूख ही पलट गया। सरकारी कर्मियों को समारोह स्थलों तक लाने की कवायद हमेशा ही औंधे मुंह गिरी थी।

2009 में नहीं मिली सरकार को सफलता

वर्ष 2009 में तत्कालीन सरकार ने बकायदा आदेश जारी कर सरकारी कर्मियों की उपस्थिति अनिवार्य बनाने की कवायद तो की, पर नतीजा शून्य रहा था। तब कुछ सरकारी कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की खानापूर्ति जरूर की गई पर सरकारी कर्मियों को खासकर कश्मीर के समारोह स्थलों तक लाने में सरकार कामयाब नहीं हो पाई थी। इस बार भी वही कवायद आरंभ हुई है। उप राज्यपाल शासन मानता है कि जम्मू संभाग में यह मुश्किल नहीं है पर कश्मीर में यह कामयाब होती नहीं दिख रही है।

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